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    27 सरपंचों के इस्तीफे से बढ़ी प्रशासन की मुश्किलें, पंचायत व्यवस्था पर सवाल

    कांकेर। छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले में ग्रामीण स्तर पर विकास कार्यों की अनदेखी को लेकर प्रशासनिक अमले और पंचायत प्रतिनिधियों के बीच एक बड़ा टकराव सामने आया है। जिले के अंतागढ़ विकासखंड के अंतर्गत आने वाले 27 सरपंचों ने अपनी मांगों के समर्थन में एक साथ सामूहिक रूप से इस्तीफा दे दिया है। ये सभी जनप्रतिनिधि पिछले तीन दिनों से नई विकास योजनाओं की प्रशासनिक मंजूरी और उनके लिए बजट जारी करने की मांग को लेकर धरने पर बैठे थे। मिली जानकारी के अनुसार, आंदोलित सरपंचों ने अपर कलेक्टर अंजोर सिंह पैकरा को अपना त्यागपत्र सौंपा। जहां एक तरफ सरपंच संघ का दावा है कि इस्तीफा देने वालों की संख्या 50 से अधिक है, वहीं जिला प्रशासन ने अभी केवल 27 सरपंचों के इस्तीफे मिलने की ही आधिकारिक पुष्टि की है।

    सरपंचों का दर्द— 'साल भर से ठप हैं काम, ग्रामीणों को क्या मुंह दिखाएं'

    सामूहिक इस्तीफा सौंपने वाले पंचायत प्रतिनिधियों का सीधा आरोप है कि पिछले एक वर्ष से उनके क्षेत्रों में किसी भी नए निर्माण या विकास कार्य को हरी झंडी नहीं दी गई है। सरपंचों का कहना है कि गांवों के लोग लगातार उनसे बुनियादी सुविधाओं और विकास का हिसाब मांगते हैं, लेकिन फंड और प्रशासनिक अनुमति के अभाव में वे ग्रामीणों को कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे पा रहे हैं। ऐसी विकट स्थिति में बिना बजट के ग्राम पंचायतों का सुचारू संचालन करना पूरी तरह असंभव हो गया था, जिसके चलते मजबूर होकर उन्हें यह कड़ा कदम उठाना पड़ा।

    पिछली बार का आश्वासन निकला खोखला, अब आर-पार की लड़ाई

    सरपंच संघ के वरिष्ठ पदाधिकारियों ने स्पष्ट किया कि वे अपनी जायज मांगों को लेकर लंबे समय से आवाज उठा रहे हैं। पिछले साल भी जब उन्होंने उग्र प्रदर्शन किया था, तब जिला प्रशासन के आला अधिकारियों ने उन्हें लिखित भरोसा दिया था कि 15 दिनों के भीतर सभी अटके हुए कार्यों को मंजूरी दे दी जाएगी। सरपंचों का आरोप है कि इस आश्वासन को पूरा एक साल बीत चुका है, लेकिन जमीनी धरातल पर एक भी ईंट नहीं रखी गई। प्रशासन के इसी टालमटोल वाले रवैये से क्षुब्ध होकर इस बार उन्होंने आर-पार की लड़ाई का बिगुल फूंक दिया है।

    प्रशासन ने आरोपों को नकारा, कहा— 'सीधे करें संपर्क'

    दूसरी ओर, जिला पंचायत प्रशासन ने सरपंचों द्वारा लगाए गए इन गंभीर आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। जिला पंचायत सीईओ का इस मामले पर कहना है कि जिले की तमाम ग्राम पंचायतों में नियम के मुताबिक विकास कार्य सुचारू रूप से संचालित किए जा रहे हैं। जिन क्षेत्रों में अतिरिक्त बजट या नए कार्यों की जरूरत है, वहां के प्रतिनिधि सीधे कार्यालय में आकर संपर्क साध सकते हैं। प्रशासन के मुताबिक, सरपंच संघ ने अपनी मांगों को स्पष्ट रूप से सामने नहीं रखा है।

    वैधानिक रूप से सामूहिक इस्तीफा मान्य नहीं, फिर भी मांगों पर विचार: कलेक्टर

    इस पूरे प्रशासनिक गतिरोध पर जिला कलेक्टर नीलेश कुमार महादेव क्षीरसागर ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि पंचायती राज नियमों के तहत सामूहिक इस्तीफे की कोई कानूनी या वैधानिक मान्यता नहीं होती है। इसके बावजूद, प्रशासन सरपंचों की हर समस्या और मांग पर सहानुभूतिपूर्वक विचार कर रहा है। उन्होंने बताया कि सभी पंचायत क्षेत्रों में विभिन्न सरकारी विभागों द्वारा वर्तमान में किए जा रहे कार्यों की एक विस्तृत सूची बनाई जा रही है, ताकि विकास की वास्तविक और सही तस्वीर सबके सामने आ सके।

    ग्रामीण अंचलों में राजनीतिक सरगर्मी तेज

    एक साथ इतनी बड़ी संख्या में सरपंचों के बागी तेवर अपनाने से कांकेर जिले के राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में हलचल काफी तेज हो गई है। जानकारों का मानना है कि यदि समय रहते जिला प्रशासन और नाराज सरपंच संघ के बीच बातचीत से कोई बीच का रास्ता नहीं निकला, तो आने वाले दिनों में यह ग्रामीण आंदोलन और उग्र रूप अख्तियार कर सकता है, जिससे सीधे तौर पर आम जनता प्रभावित होगी।

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