More
    Homeधर्म-समाजसिम्हाचलम पहाड़ी पर स्थित है सृष्टि का सबसे शक्तिशाली मंदिर, यहां भक्त...

    सिम्हाचलम पहाड़ी पर स्थित है सृष्टि का सबसे शक्तिशाली मंदिर, यहां भक्त की रक्षा के लिए स्वयं नारायण ने लिया था अवतार

    वर्तमान में भगवान विष्णु को प्रिय पुरुषोत्तम मास चल रहा है. इस महीने में दान-पुण्य के साथ ही नारायण के दर्शन-पूजन का भी विशेष विधान है. इस महीने में भगवान विष्णु के दर्शन-पूजन की विशेष मान्यता है. देश-दुनिया में नारायण के कई मंदिर हैं, जो श्रद्धा और इतिहास के साथ वास्तुकला का अद्भुत संगम भी दिखाते हैं. ऐसा ही एक भव्य मंदिर आंध्र प्रदेश में विशाखापत्तनम के सिम्हाचलम पहाड़ी पर बना श्रीवराह लक्ष्मी नरसिम्हा स्वामी मंदिर है. राज्य के प्रमुख तीर्थ स्थलों में शामिल मंदिर को लेकर मान्यता है कि भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए भगवान नरसिंह इसी स्थान पर प्रकट हुए थे.
    सिम्हाचलम पहाड़ी पर बना यह मंदिर
    श्रीवराह लक्ष्मी नरसिम्हा स्वामी मंदिर में बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं. करीब 300 मीटर ऊंची सिम्हाचलम पहाड़ी पर बना यह मंदिर अपनी भव्य संरचना और शांत वातावरण के लिए प्रसिद्ध है. मंदिर परिसर में विशाल प्रांगण, ऊंचे प्रवेश द्वार और दीवारों पर की गई बारीक नक्काशी श्रद्धालुओं और पर्यटकों को आकर्षित करती है. यहां से विशाखापत्तनम शहर और आसपास की पहाड़ियों का सुंदर दृश्य भी दिखाई देता है.

    वराह और नरसिंह दोनों स्वरूपों की पूजा
    इस मंदिर की सबसे खास बात यह है कि यहां भगवान विष्णु के वराह और नरसिंह दोनों स्वरूपों की पूजा की जाती है. मंदिर में विराजमान मूर्ति पूरे साल चंदन के लेप से ढकी रहती है. केवल अक्षय तृतीया के अवसर पर ‘चंदनोत्सव’ के दौरान भक्तों को भगवान का वास्तविक स्वरूप देखने का अवसर मिलता है. इस दिन मंदिर में बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं.
    मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथा
    मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथा के अनुसार, हिरण्यकश्यप नामक असुर राजा चाहता था कि पूरी दुनिया उसकी पूजा करे, लेकिन उसका पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का भक्त था. इससे क्रोधित होकर हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को कई बार मारने की कोशिश की. कहा जाता है कि एक बार उसने प्रह्लाद को पहाड़ी से नीचे फेंकने का प्रयास किया, लेकिन भगवान विष्णु ने उनकी रक्षा की. मान्यता है कि जिस स्थान पर भगवान ने प्रह्लाद को बचाया था, वहीं आज यह मंदिर स्थित है.
    11वीं शताब्दी में मंदिर का निर्माण
    इतिहास के अनुसार, मंदिर का निर्माण लगभग 11वीं शताब्दी में हुआ माना जाता है. यहां कई प्राचीन शिलालेख मौजूद हैं, जो चोल और विजयनगर साम्राज्य के समय से जुड़े हैं. विजयनगर साम्राज्य के राजा कृष्णदेवराय ने भी इस मंदिर का दौरा किया था. बताया जाता है कि उन्होंने मंदिर को कई गांव और बहुमूल्य आभूषण दान किए थे. मंदिर में आज भी उनके समय के शिलालेख सुरक्षित हैं.
    अच्छाई की बुराई पर विजय का प्रतीक
    सिम्हाचलम मंदिर की वास्तुकला भी बेहद खास मानी जाती है. यह मंदिर अन्य मंदिरों से अलग पश्चिम दिशा की ओर मुख किए हुए है, जबकि अधिकांश हिंदू मंदिर पूर्व दिशा की ओर बने होते हैं. गर्भगृह में भगवान विष्णु के वराह अवतार के साथ माता लक्ष्मी भी विराजमान हैं. धार्मिक मान्यता के अनुसार, यह व्यवस्था अच्छाई की बुराई पर विजय का प्रतीक मानी जाती है. मंदिर के पास स्थित ‘स्वामी पुष्करिणी’ और ‘गंगाधारा’ नामक प्राचीन जल स्रोत इसकी ऐतिहासिक पहचान को और मजबूत करते हैं.
    सालभर कई धार्मिक उत्सव
    मंदिर में सालभर कई धार्मिक उत्सव मनाए जाते हैं. इनमें चंदनोत्सव, नरसिंह जन्मोत्सव, कल्याणोत्सव और नवरात्र उत्सव प्रमुख हैं. दर्शन के लिए मंदिर सुबह 6:30 बजे से दोपहर 2:30 बजे तक खुला रहता है. इसके बाद शाम 3:30 बजे से रात 9 बजे तक श्रद्धालु दर्शन कर सकते हैं. सिम्हाचलम मंदिर केवल धार्मिक आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि पर्यटन के लिहाज से भी बेहद खास स्थान है. मंदिर के आसपास कैलासगिरी हिलटॉप पार्क, आरके बीच और प्रसिद्ध सबमरीन म्यूजियम जैसे पर्यटन स्थल मौजूद हैं. ऐसे में यहां आने वाले श्रद्धालु आध्यात्मिक अनुभव के साथ-साथ प्राकृतिक सुंदरता और ऐतिहासिक स्थलों का भी आनंद ले सकते हैं.

    latest articles

    explore more

    LEAVE A REPLY

    Please enter your comment!
    Please enter your name here