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    ज्येष्ठ पूर्णिमा पर दिखने वाला है स्कॉर्पियो ब्लू मून, जानें यह कब बनता है और कितने होते हैं मून फेज

    ज्येष्ठ पूर्णिमा की रात आसमान में दिखने वाला है दुर्लभ स्कॉर्पियो ब्लू मून, जिसे लेकर खगोल प्रेमियों में उत्सुकता बढ़ गई है. माना जा रहा है कि यह विशेष खगोलीय घटना चांद के अलग-अलग मून फेज को समझने का सुनहरा मौका होगी. इस मौके पर जानिए स्कॉर्पियो ब्लू मून वास्तव में कब बनता है, इसकी खासियत क्या है और चांद के कुल कितने मून फेज होते हैं…

    मई यानी ज्येष्ठ पूर्णिमा पर आसमान में स्कॉर्पियो ब्लू मून का खूबसूरत नजारा देखने को मिलेगा. जब एक माह में दो पूर्णिमा होती हैं, तब दूसरी पूर्णिमा को ब्लू मून कहा जाता है. इस दिन चंद्रमा मंगल ग्रह की राशि वृश्चिक में संचार करेंगे, जिससे ब्लू मून को स्कॉर्पियो ब्लू मून कहा जा रहा है. हिंदू धर्म में अधिकमास की ज्येष्ठ पूर्णिमा का विशेष महत्व माना जाता है. इस दिन व्रत रखकर भगवान नारायण और माता लक्ष्मी की पूजा अर्चना की जाती है और सत्यनारायण का पाठ किया जाता है. ऐसे में अधिकमास की ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन स्कॉर्पियो ब्लू मून का होना बेहद दुर्लभ संयोग माना जा रहा है. आइए जानते हैं कितने होते हैं मून फेज…
    सबसे चमकदार रूप में दिखाई देता है चंद्रमा – ब्लू मून को फुल मून भी कहा जाता है. पूर्णिमा यानी फुल मून वह खगोलीय स्थिति होती है, जब चंद्रमा का पृथ्वी की ओर वाला हिस्सा सूर्य की रोशनी से पूरी तरह प्रकाशित हो जाता है. इस दौरान चांद अपने सबसे चमकदार रूप में दिखाई देता है. हालांकि, हर रात चांद का आकार और स्वरूप बदलता हुआ नजर आता है. यह बदलाव चंद्रमा की विभिन्न कलाओं (मून फेज) के कारण होता है, जो लगभग 29.5 दिनों के चक्र में लगातार बदलती रहती हैं.
    पृथ्वी के चारों ओर लगातार परिक्रमा करता चंद्रमा – वैज्ञानिकों के अनुसार, सूर्य हमारे सौर मंडल का एकमात्र ऐसा पिंड है, जो स्वयं प्रकाश उत्सर्जित करता है. सूर्य की रोशनी पृथ्वी और चंद्रमा पर पड़ती है. चंद्रमा अपनी रोशनी स्वयं नहीं बनाता, बल्कि सूर्य के प्रकाश को परावर्तित करता है. इसी परावर्तित प्रकाश को हम चांदनी के रूप में देखते हैं. चंद्रमा पृथ्वी के चारों ओर लगातार परिक्रमा करता रहता है, जिसके कारण पृथ्वी से दिखाई देने वाला उसका प्रकाशित हिस्सा बदलता रहता है.
    चंद्रमा की 8 कलाएं – चंद्रमा की कुल आठ प्रमुख कलाएं होती हैं. इनमें अमावस्या (न्यू मून), बढ़ता हुआ अर्धचंद्र (वैक्सिंग क्रिसेंट), प्रथम चतुर्थांश (फर्स्ट क्वार्टर), बढ़ता हुआ गिबस (वैक्सिंग गिबस), पूर्णिमा (फुल मून), घटता हुआ गिबस (वेनिंग गिबस), तृतीय चतुर्थांश (थर्ड क्वार्टर) और घटता हुआ अर्धचंद्र (वेनिंग क्रिसेंट) शामिल हैं. यह पूरा चक्र लगभग हर 29.5 दिनों में दोहराया जाता है.

    कैसे बनता है फुल मून? – फुल मून तब होता है, जब पृथ्वी, चंद्रमा और सूर्य लगभग एक सीध में होते हैं. पृथ्वी से देखने पर चंद्रमा सूर्य के ठीक विपरीत दिशा में स्थित होता है. इस स्थिति में चंद्रमा का पूरा प्रकाशित भाग पृथ्वी से दिखाई देता है और वह गोल तथा बेहद चमकदार नजर आता है. पूर्णिमा का चांद आमतौर पर सूर्यास्त के समय उगता है और सूर्योदय के समय अस्त होता है.
    सुपरमून की अवधारणा – खगोल विज्ञान में सुपरमून, ब्लड मून, ब्लू मून और हार्वेस्ट मून जैसे विशेष चंद्र घटनाक्रम भी होते हैं. सुपरमून के दौरान चंद्रमा पृथ्वी के अपेक्षाकृत करीब होता है, जिससे वह सामान्य से बड़ा और अधिक चमकीला दिखाई देता है. वहीं, ब्लड मून के दौरान चंद्र ग्रहण की स्थिति में चांद लाल रंग का नजर आ सकता है.
    क्या होता है ब्लू मून? – ब्लू मून का नाम सुनकर भले ही चांद के नीले रंग का आभास हो, लेकिन वास्तव में इसका रंग नीला नहीं होता. आमतौर पर ब्लू मून उस दूसरी पूर्णिमा को कहा जाता है, जो एक ही कैलेंडर माह में आती है. 31 मई की पूर्णिमा भी एक ब्लू मून होगी. खगोल विज्ञान में एक अन्य परिभाषा के अनुसार, किसी मौसम में चार पूर्णिमाओं के होने पर तीसरी पूर्णिमा को भी ब्लू मून कहा जाता है.

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