लोकगीत संगोष्ठी में विद्वानों ने कहा- मौखिक परंपराओं को लिपिबद्ध करना समय की आवश्यकता
अलवर। साझा संसार फाउंडेशन नीदरलैंड्स एवं जाट बहरोड़ भारत की पहल पर ‘राठ की चौपाल’ के अंतर्गत “भारतीय लोकगीतों में जन्मोत्सव की परम्परा” विषय पर ऑनलाइन संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता मानवशास्त्री एवं साहित्यकार ज्ञानचंद बागड़ी ने की।
संगोष्ठी में रूस से डॉ. तत्याना ओरांसकाया मुख्य अतिथि, प्रो. डॉ. मीरा गौतम मुख्य वक्ता तथा डॉ. कृष्णा कुमारी आर्य विशिष्ट अतिथि के रूप में शामिल हुईं। इसके अलावा सवाई माधोपुर से रेखा मीणा, कान्हवास माजरा राठ क्षेत्र से पिंकी देवी, जयपुर से गीता परसोया एवं अनिता देवी, तथा निवाई से हिमानी राजवंशी ने प्रतिभागी के रूप में सहभागिता की।
लोकगीत भावों और संस्कृति की जीवंत अभिव्यक्ति
साझा संसार फाउंडेशन के अध्यक्ष डॉ. रामा तक्षक ने सभी प्रतिभागियों एवं श्रोताओं का स्वागत करते हुए कहा कि लोकगीत भावों की अभिव्यक्ति हैं और भारतीय संस्कृति की ऊष्मा को संजोए रखने में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका है। उन्होंने कहा कि जन्मोत्सव जैसे अवसर पारिवारिक संवेदनाओं और रिश्तों के भावनात्मक मेल का प्रतीक होते हैं तथा इन अवसरों पर गाए जाने वाले लोकगीत जीवन के सच्चे साथी हैं। उन्होंने लोकगीतों के व्यवस्थित दस्तावेजीकरण की आवश्यकता पर भी बल दिया।
लोकगीत इतिहास और संस्कृति के संरक्षक
अध्यक्षीय उद्बोधन में ज्ञानचंद बागड़ी ने कहा कि लोकगीत इतिहास और संस्कृति के सच्चे पहरुए एवं संरक्षक हैं। उन्होंने कहा कि मौखिक परंपरा के रूप में संरक्षित यह धरोहर यदि समय रहते लिखित रूप में सुरक्षित नहीं की गई तो इसके विलुप्त होने का खतरा बढ़ जाएगा।
मुख्य अतिथि डॉ. तत्याना ओरांसकाया ने लोकगीतों के महत्व को रेखांकित करते हुए बुंदेलखंड के लोकनायक लाला हरदौल का उदाहरण प्रस्तुत किया। वहीं प्रो. डॉ. मीरा गौतम ने कहा कि लोकगीतों के माध्यम से हम अपनी विशाल शब्द-संपदा और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित कर सकते हैं। डॉ. कृष्णा कुमारी आर्य ने लोकसंस्कृति के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए इस प्रकार के आयोजनों को महत्वपूर्ण पहल बताया।
लोकगीतों की प्रस्तुतियों ने बांधा समां
कार्यक्रम में डॉ. हरिसिंह पाल, महामंत्री, नागरी लिपि परिषद, ने कहा कि यह आयोजन भारतीय लोकगीतों का एक महत्वपूर्ण सम्मेलन है और इसकी श्रृंखला को निरंतर जारी रखा जाना चाहिए। उन्होंने भी लोकगीतों को लिपिबद्ध करने की आवश्यकता पर बल दिया।
सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के दौरान गीता परसोया ने “कुणको कुणको ओ नान्हया, कुणको जायो ओ नान्हया”, अनिता देवी ने “जच्चा नहा ले नहाण संजो ले, म्हारी घणी मजाजण जच्चा”, हिमानी राजवंशी ने “म्हारी जच्चा की कमर साढ़े सोला बल खाय” तथा रेखा मीणा ने “सेरे एक दाल, भिजोदो इमरती बन जायेगी” जैसे लोकगीत प्रस्तुत कर कार्यक्रम को लोकसंस्कृति की मधुर स्वर लहरियों से सराबोर कर दिया।
कार्यक्रम में श्रीलंका से ब्रसील जी, अलवर से जगदीप तक्षक एवं राजेश, तथा पटना से सोनू कुमार भी ऑनलाइन जुड़े। कार्यक्रम का सफल संचालन डॉ. सुमन ने किया तथा सभी प्रतिभागियों एवं अतिथियों का आभार व्यक्त किया।
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