नई दिल्ली:दुनिया भर के शेयर बाजारों और केंद्रीय बैंकों के काम करने के पारंपरिक तौर-तरीकों में जल्द ही एक बहुत बड़ा उलटफेर देखने को मिल सकता है। अमेरिका के केंद्रीय बैंक 'फेडरल रिजर्व' की कमान संभालने जा रहे नए चेयरमैन केविन वॉर्श एक ऐसी नई नीति की रूपरेखा तैयार कर रहे हैं, जो वैश्विक अर्थव्यवस्था और वित्तीय बाजारों की दिशा बदल सकती है। भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) रिसर्च की एक होलिया रिपोर्ट के अनुसार, वॉर्श के कार्यकाल में फेडरल रिजर्व का कामकाज पिछले कुछ सालों से चली आ रही ज्यादा बातचीत और खुले संवाद वाली शैली से पूरी तरह अलग होने वाला है। इस बदलाव का सीधा असर भारत सहित दुनिया भर के नीति निर्माताओं और निवेशकों पर पड़ेगा।
कम संवाद और आर्थिक आंकड़ों पर बढ़ती निर्भरता
एसबीआई रिसर्च के विश्लेषण के मुताबिक, नए चेयरमैन केविन वॉर्श का नजरिया केवल सख्त फैसले लेने तक सीमित नहीं है, बल्कि वे व्यवस्था में एक बड़ा नीतिगत बदलाव करना चाहते हैं। वे केंद्रीय बैंक की तरफ से भविष्य के कदमों को लेकर पहले से दिए जाने वाले संकेतों या बयानों को सीमित करने के पक्ष में हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि आने वाले समय में दुनिया भर के बाजारों को फेडरल रिजर्व के बयानों के भरोसे रहने के बजाय सीधे तौर पर वास्तविक आर्थिक आंकड़ों का अध्ययन करना होगा। वॉर्श नीतिगत टूल्स को सीमित रखने, बैलेंस शीट का आकार छोटा करने और अपने सार्वजनिक बयानों में अत्यधिक संयम बरतने की रणनीति पर काम कर रहे हैं।
मौजूदा वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच नई नीति के खतरे
आमतौर पर शांत और स्थिर वैश्विक माहौल में केंद्रीय बैंक का कम बोलना उसकी गंभीरता और साख को मजबूत करता है, लेकिन मौजूदा दौर बेहद संवेदनशील और पेचीदा हो चुका है। इस समय पूरी दुनिया भू-राजनीतिक टकराव, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के उभार से पैदा हो रही नई चुनौतियों, भारी राजकोषीय घाटे और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में टैरिफ से जुड़ी अनिश्चितताओं से जूझ रही है। रिपोर्ट में इस बात को लेकर सचेत किया गया है कि कम बोलने या गुप्त रहने की यह रणनीति तभी कारगर होती है जब दुनिया में भ्रम की स्थिति कम हो। अगर फेडरल रिजर्व अपनी नीतियों के बदलावों को लेकर स्पष्ट पैमाने तय नहीं करता है, तो बाजारों में भ्रम बढ़ेगा और यह पूरी दुनिया के लिए एक बड़ी मुसीबत बन सकता है।
डॉलर की मजबूती और वैश्विक बाजारों पर सीधा प्रभाव
फेडरल रिजर्व के रुख में आने वाले इस बदलाव का सीधा और गहरा असर अंतरराष्ट्रीय ट्रेजरी यील्ड, अमेरिकी डॉलर की ताकत, वैश्विक पूंजी के प्रवाह और दुनिया भर में कर्ज की लागत पर दिखाई देगा। वॉर्श की इन रणनीतियों के चलते अमेरिकी डॉलर के और ज्यादा मजबूत होने की पूरी संभावना है। मजबूत डॉलर भले ही अमेरिका में आयात को सस्ता करके वहां की महंगाई पर लगाम लगाने में मदद करे, लेकिन इससे अमेरिकी निर्यातकों को बड़ा नुकसान उठाना पड़ेगा। सबसे ज्यादा परेशानी उन विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं को होगी जिन्होंने डॉलर में भारी कर्ज ले रखा है, क्योंकि उनके लिए अब इस कर्ज की किस्तें चुकाना बहुत महंगा हो जाएगा।
विश्वसनीयता और संस्थागत स्वतंत्रता की बड़ी चुनौती
एसबीआई रिसर्च ने रेखांकित किया है कि एक भरोसेमंद फेडरल रिजर्व पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था के लिए एक मजबूत स्तंभ की तरह काम करता है, जबकि एक भ्रमित केंद्रीय बैंक वैश्विक स्तर पर एक अदृश्य बोझ की तरह साबित होता है। केविन वॉर्श के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती अपनी संस्थागत स्वतंत्रता को बरकरार रखते हुए नीतिगत साख के बीच एक सही संतुलन स्थापित करने की होगी। अगर वे अपनी इस नई और कम बोलने वाली नीति के बीच पारदर्शिता बनाए रखने में कामयाब होते हैं, तो इससे अमेरिकी अर्थव्यवस्था के प्रति भरोसा और मजबूत होगा। इसके विपरीत, यदि इस चुप्पी से बाजार में अनिश्चितता का माहौल बनता है, तो दुनिया भर के वित्तीय बाजारों में भारी उथल-पुथल की स्थिति पैदा हो सकती है।


