नई दिल्ली/चेन्नई: तमिलनाडु में गोवध पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के मद्रास हाई कोर्ट के फैसले को राज्य सरकार ने देश की शीर्ष अदालत में चुनौती दी है। सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर करते हुए राज्य सरकार ने दलील दी है कि हाई कोर्ट का गत 27 मई का यह आदेश प्रदेश में वर्तमान में प्रभावी कानूनी प्रावधानों के दायरे से बाहर जाकर पारित किया गया है। सरकार का मानना है कि इस न्यायिक निर्देश से राज्य की स्थापित कानूनी और प्रशासनिक व्यवस्था प्रभावित हो रही है, जिसके चलते इस पर कानूनी समीक्षा की आवश्यकता है।
मौजूदा कानून और नियमों का दिया हवाला
सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में तमिलनाडु सरकार ने स्पष्ट किया है कि राज्य में पहले से ही 'तमिलनाडु पशु संरक्षण अधिनियम 1958' लागू है। इस मौजूदा कानून के अंतर्गत निर्धारित दिशा-निर्देशों, कड़े नियमों और सक्षम प्राधिकारी की पूर्व अनुमति के साथ विशेष व असाधारण परिस्थितियों में पशुओं के वध का कानूनी प्रावधान मौजूद है। सरकार का तर्क है कि मद्रास उच्च न्यायालय का नया आदेश व्यावहारिक धरातल पर एकतरफा और पूर्ण प्रतिबंध थोपने जैसा है, जो विधायिका द्वारा बनाए गए मूल अधिनियम की भावना और मंशा के सर्वथा विपरीत है।
न्यायिक समीक्षा और विधायी अधिकारों पर जोर
राज्य सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय से मद्रास हाई कोर्ट के इस फैसले की वैधानिकता और क्षेत्राधिकार की बारीकी से समीक्षा करने का पुरजोर आग्रह किया है। याचिका में यह संवैधानिक बिंदु भी उठाया गया है कि अदालत का यह निर्देश सीधे तौर पर कार्यपालिका और विधायिका के उन अधिकारों में हस्तक्षेप जैसा है, जिसके तहत कानून बनाने या संशोधन करने का अधिकार केवल जनता द्वारा चुनी गई सरकार को होता है। सरकार के अनुसार, किसी भी न्यायिक आदेश के माध्यम से स्थापित कानून के मूल स्वरूप को नहीं बदला जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट के रुख पर टिकी नजरें
इस संवेदनशील और महत्वपूर्ण कानूनी मामले में अब गेंद सुप्रीम कोर्ट के पाले में है। शीर्ष अदालत को अब यह तय करना होगा कि क्या मद्रास उच्च न्यायालय का आदेश संवैधानिक और कानूनी परिधि के भीतर था या फिर राज्य सरकार द्वारा जताई गईं आपत्तियां और दलीलें न्यायसंगत हैं। देश के कानूनी और राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस मामले में आने वाला फैसला न केवल तमिलनाडु में पशु संरक्षण और गोवध से जुड़ी कानूनी स्थिति को स्पष्ट करेगा, बल्कि राज्यों के विधायी अधिकारों और न्यायिक सक्रियता की सीमाओं को लेकर भी भविष्य के लिए एक बड़ी मिसाल तय करेगा।


