चातुर्मास शुरू होते ही विवाह और उपनयन संस्कार पर लगेगा विराम, देवउठनी एकादशी के बाद फिर मिलेंगे शुभ मुहूर्त
लक्ष्मणगढ़। आगामी 12 जुलाई को पड़ने वाली देवशयनी एकादशी के साथ ही सनातन परंपरा के अनुसार चातुर्मास का आरंभ हो जाएगा। इसके बाद विवाह, उपनयन (जनेऊ) सहित सभी प्रमुख मांगलिक कार्यों पर लगभग चार माह का विराम लग जाएगा। अब विवाह योग्य युवक-युवतियों और उनके परिवारों को अगले शुभ मुहूर्त के लिए 22 नवंबर तक इंतजार करना होगा।
योग शिक्षक एवं ज्योतिषाचार्य पंडित लोकेश कुमार के अनुसार, देवशयनी एकादशी के बाद भगवान विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं। इस अवधि में गुरु एवं शुक्र ग्रह की स्थिति शुभ नहीं मानी जाती, इसलिए हिंदू शास्त्रों के अनुसार विवाह सहित मांगलिक कार्य नहीं किए जाते।
22 नवंबर से फिर शुरू होंगे विवाह के शुभ मुहूर्त
ज्योतिषीय गणना के अनुसार, देवउठनी एकादशी के बाद 22 नवंबर से विवाह के शुभ मुहूर्त दोबारा प्रारंभ होंगे। 22 नवंबर से अगले वर्ष 7 जुलाई तक विवाह के लिए 63 शुभ मुहूर्त उपलब्ध रहेंगे।
नवंबर 2026 के विवाह मुहूर्त:
22, 25, 26 और 30 नवंबर
दिसंबर 2026 के विवाह मुहूर्त:
4, 6, 9, 10, 11 और 14 दिसंबर
उपनयन संस्कार के लिए करना होगा अगले वर्ष का इंतजार
विवाह के मुहूर्त तो नवंबर में उपलब्ध हो जाएंगे, लेकिन उपनयन (जनेऊ) संस्कार के लिए इस वर्ष कोई शुभ मुहूर्त नहीं रहेगा। ज्योतिषीय गणना के अनुसार अब उपनयन संस्कार के शुभ मुहूर्त 9 फरवरी 2027 से प्रारंभ होंगे। इसके बाद फरवरी, मार्च, अप्रैल, मई और जुलाई तक कई शुभ तिथियां उपलब्ध रहेंगी।
चातुर्मास में क्यों नहीं होते मांगलिक कार्य?
वैदिक मान्यताओं के अनुसार, देवशयनी एकादशी से देवउठनी एकादशी तक भगवान विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा में रहते हैं। इस अवधि को चातुर्मास कहा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस समय गुरु और शुक्र ग्रह का शुभ प्रभाव कम हो जाता है। गुरु को ज्ञान एवं संतान का तथा शुक्र को दांपत्य सुख का कारक माना गया है। इसलिए इस अवधि में विवाह, उपनयन और अन्य मांगलिक कार्यों से परहेज किया जाता है।
धार्मिक परंपराओं के अनुसार, चातुर्मास का समय साधना, पूजा-पाठ, व्रत, जप-तप और आध्यात्मिक साधना के लिए विशेष रूप से शुभ माना जाता है।
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