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    नर्मदा में बेखौफ रेत माफिया! NGT के आदेश हवा में, बाढ़ के बाद सामने आया सच

    होशंगाबाद। राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) के कड़े दिशा-निर्देशों और कानूनी बंदिशों को ताक पर रखकर प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करने वाले तत्वों की मनमानी थमने का नाम नहीं ले रही है। सरकारी तंत्र की अनदेखी का फायदा उठाकर न केवल कानून का मखौल उड़ाया जा रहा है, बल्कि प्राकृतिक संपदा को भी अपूरणीय क्षति पहुंचाई जा रही है, जिसका खुलासा प्रकृति ने खुद एक अचानक आए संकट के जरिए कर दिया है।

    नर्मदा की उफनती लहरों ने खोला अवैध रेत खनन का बड़ा राज

    क्षेत्र से गुजरने वाली जीवनदायिनी नर्मदा नदी में अचानक आई बाढ़ ने रेत के काले कारोबार में लिप्त रसूखदारों के दावों की पोल खोलकर रख दी है। एक निजी खनन कंपनी द्वारा नियमों को ताक पर रखकर नदी के बीचों-बीच रेत निकालने का खेल धड़ल्ले से खेला जा रहा था। इस अवैध काम को अंजाम देने के लिए नदी के प्राकृतिक बहाव को पूरी तरह से बाधित कर दिया गया था, लेकिन ऊपरी इलाकों में हुई मूसलाधार बारिश के बाद जैसे ही जलस्तर बढ़ा, प्रकृति के रौद्र रूप के सामने माफियाओं का यह गुप्त साम्राज्य ताश के पत्तों की तरह बिखर गया।

    बाढ़ के तेज बहाव में बहा अस्थाई पुल और नदी के बीच फंसीं करोड़ों की मशीनें

    खनन कंपनी ने नदी के सीने को चीरकर भारी वाहनों की आवाजाही के लिए पानी के बीचों-बीच एक बड़ा मिट्टी का अस्थाई रैंप (रास्ता) तैयार कर लिया था। इस रास्ते के जरिए दर्जनों पोकलेन मशीनें और भारी डंपर नदी के बीच उतारकर चौबीसों घंटे अंधाधुंध खुदाई की जा रही थी। भारी जलभराव के कारण वह अवैध रास्ता पानी के तेज करंट में पूरी तरह विलीन हो गया, जिसके चलते रेत निकालने के लिए पानी के भीतर उतारी गई करोड़ों रुपये मूल्य की विशाल मशीनें और डंपर चारों तरफ से गहरे पानी से घिर गए और वहीं फंसकर रह गए।

    जिम्मेदार विभागों की संदेहास्पद खामोशी और कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल

    इस पूरे घटनाक्रम ने पर्यावरण सुरक्षा का दम भरने वाले स्थानीय प्रशासन और खनिज विभाग की कार्यशैली को पूरी तरह कटघरे में खड़ा कर दिया है। जब पर्यावरण की सुरक्षा के लिए ग्रीन ट्रिब्यूनल की सख्त पाबंदियां लागू हैं, तो अधिकारियों की नाक के नीचे इतना बड़ा अवैध नेटवर्क कैसे फल-फूल रहा था। ग्रामीणों का सीधा आरोप है कि इतने बड़े पैमाने पर भारी मशीनों का नदी के अंदर पहुंचना बिना प्रशासनिक संरक्षण और सांठगांठ के मुमकिन ही नहीं है, जिसके कारण जिम्मेदार अधिकारी आँखें मूंदे बैठे रहे।

    बड़ी जनहानि की आशंका और ग्रामीणों की सुरक्षा पर मंडराता गंभीर खतरा

    नदी की मुख्य जलधारा से इस तरह की छेड़छाड़ ने अब तटीय इलाकों और आसपास के गांवों के लिए एक बड़ा संकट पैदा कर दिया है। अगर बाढ़ के वक्त इन मशीनों को ऑपरेट करने वाले मजदूर या चालक वहां मौजूद होते, तो एक भीषण त्रासदी होना तय था। प्राकृतिक बहाव के बदलने से अब ग्रामीण इलाकों में बाढ़ का पानी घुसने का डर सताने लगा है, लेकिन इस बेहद संवेदनशील मामले और भारी लापरवाही के बाद भी संबंधित कंपनी के खिलाफ अब तक किसी ठोस कानूनी कार्रवाई की शुरुआत नहीं हो सकी है।

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