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    यूजीसी से आरआरबीएमयू की 2017 शिक्षा (Education) में पीएचडी प्रवेश प्रक्रिया की जांच की मांग

     शोध-निर्देशकों की पात्रता, प्रशासनिक लापरवाही और वर्षों की देरी का आरोप लगाया, पीड़ितों के लिए क्षतिपूर्ति की भी उठाई मांग
    अलवर। राज ऋषि भर्तृहरि मत्स्य विश्वविद्यालय (आरआरबीएमयू), अलवर की वर्ष 2017 की पीएचडी प्रवेश प्रक्रिया को लेकर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) में एक विस्तृत शिकायत भेजी गई है। शिकायत में विश्वविद्यालय पर यूजीसी के पीएचडी विनियमों की अनदेखी, अपात्र शोध-निर्देशकों की नियुक्ति, प्रवेश प्रक्रिया में पारदर्शिता का अभाव तथा शोधार्थियों के कई वर्ष बर्बाद करने जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं।
    डाॅ. सत्यवीर यादव , शिकायतकर्ता
    डाॅ. सत्यवीर यादव , शिकायतकर्ता
    प्राइवेट कॉलेज के प्रोफेसर डॉ. सत्यवीर यादव की ओर से संबंधित अधिकारियों की ओर से लिखे पत्र में कहा गया है कि विश्वविद्यालय ने वर्ष 2017 में पीएचडी प्रवेश परीक्षा आयोजित कर शोधार्थियों को प्रवेश तो दे दिया, लेकिन जिन शोध-निर्देशकों का आवंटन किया गया वे यूजीसी के निर्धारित मानकों के अनुरूप पात्र नहीं थे। आरोप है कि कई शोध-निर्देशकों के पास आवश्यक अनुभव, स्वीकृत पद अथवा यूजीसी नियमों के अनुरूप पात्रता नहीं थी।
    शिकायत में उल्लेख किया गया है कि अप्रैल 2024 में स्वयं विश्वविद्यालय ने एक आदेश जारी कर शोध कार्य को स्थगित कर दिया था। इसमें कहा गया था कि आवंटित शोध-निर्देशक यूजीसी विनियमों के अनुरूप नहीं पाए गए हैं। इसके कारण शोधार्थियों का शोध कार्य वर्षों तक ठप रहा और उन्हें शैक्षणिक व व्यावसायिक नुकसान उठाना पड़ा।
    शोधार्थियों ने इस मामले में राजस्थान हाईकोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया था। शिकायत में दावा किया गया है कि न्यायालय में विश्वविद्यालय की ओर से प्रशासनिक चूक स्वीकार करते हुए सुधारात्मक कदम उठाने का आश्वासन दिया गया था। इसी आधार पर याचिका वापस ले ली गई थी।
    हालांकि अब विश्वविद्यालय ने प्रभावित शोधार्थियों को मार्च 2027 तक शोध प्रबंध जमा करने के निर्देश जारी किए हैं। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि विश्वविद्यालय की अपनी लापरवाही के कारण कई वर्ष नष्ट होने के बाद इतनी कम अवधि में गुणवत्तापूर्ण शोध पूरा करना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है। उनका आरोप है कि इससे शोध की गुणवत्ता और अकादमिक मानकों पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
    शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि विश्वविद्यालय ने उन शोध-निर्देशकों की पात्रता का दोबारा पारदर्शी सत्यापन नहीं कराया, जिनकी पात्रता पहले ही सवालों के घेरे में आ चुकी थी। साथ ही प्रवेश प्रक्रिया के दौरान उपलब्ध शोध-निर्देशकों, रिक्त सीटों और विषयवार शोध क्षमता का विवरण भी सार्वजनिक नहीं किया गया।
    यूजीसी से की गई शिकायत में स्वतंत्र जांच कराने, सभी शोध-निर्देशकों की पात्रता की समीक्षा करने, आवश्यक होने पर नए शोध-निर्देशक नियुक्त करने, शोध अवधि बढ़ाने तथा विश्वविद्यालय की प्रशासनिक लापरवाही से प्रभावित शोधार्थियों को उचित राहत एवं क्षतिपूर्ति उपलब्ध कराने की मांग की गई है। शिकायतकर्ताओं ने यह भी आग्रह किया है कि भविष्य में पीएचडी प्रवेश प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी बनाई जाए ताकि ऐसी स्थिति दोबारा उत्पन्न न हो। शोध निर्देशको से भी एक शपथ पत्र लिया जाए कि वे यूजीसी के अनुसार शोध निर्देशक बनने की सभी योग्यताएं रखते हैं ।

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