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    भारत की अस्त्र मिसाइल की बढ़ी मांग, आर्मेनिया-सऊदी अरब समेत कई देशों की नजर

    नई दिल्ली: इंडोनेशिया के बाद अब आर्मेनिया और सऊदी अरब ने भी भारत की दुश्मन के रडार से बच निकलने में सक्षम स्वदेशी 'अस्त्र' मिसाइल को खरीदने में गहरा रुझान दिखाया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया इंडोनेशिया यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल के साथ-साथ हवा से हवा में मार करने वाली इस अत्याधुनिक स्वदेशी मिसाइल को लेकर सहमति बनी थी। रक्षा क्षेत्र के सूत्रों के अनुसार, इंडोनेशिया के नक्शेकदम पर चलते हुए अब आर्मेनिया और सऊदी अरब भी भारत के साथ अस्त्र मिसाइल सौदे पर द्विपक्षीय बातचीत कर रहे हैं। आने वाले समय में वैश्विक स्तर पर कई अन्य देश भी इस स्वदेशी हथियार प्रणाली को हासिल करने की दौड़ में शामिल हो सकते हैं।

    आर्मेनियाई वायुसेना के सुखोई-30 बेड़े के लिए सबसे मुफीद साबित होगा अस्त्र मिसाइल का सौदा

    सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक आर्मेनिया इस समय अस्त्र मिसाइल को अपने रक्षा बेड़े में शामिल करने की रेस में सबसे आगे चल रहा है। आर्मेनियाई वायुसेना के पास सुखोई-30 फाइटर जेट्स का बेड़ा मौजूद है, जो इस सौदे को बेहद व्यावहारिक बनाता है। चूंकि भारतीय वायुसेना पहले ही अपने सुखोई-30 लड़ाकू विमानों के साथ अस्त्र मिसाइल का सफल एकीकरण कर चुकी है, इसलिए आर्मेनिया के लिए यह तकनीकी रूप से सबसे उपयुक्त सौदा साबित हो सकता है। आर्मेनिया अपने फाइटर जेट्स के आधुनिकीकरण के लिए भारत के समृद्ध अनुभव का लाभ उठाने का इच्छुक है।

    भारत और आर्मेनिया के बीच अंतरिक्ष, साइबर सुरक्षा और सामरिक संचार पर भी सहयोग की राह आसान

    अस्त्र मिसाइल सौदे के साथ-साथ भारत और आर्मेनिया अपने रक्षा व तकनीकी संबंधों को नए आयाम देने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। दोनों देश निगरानी प्रणालियों, अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी, साइबर सुरक्षा, सामरिक संचार और सैन्य प्रशिक्षण जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में आपसी सहयोग की असीम संभावनाएं तलाश रहे हैं। इससे पूर्व चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) जनरल अनिल चौहान की आर्मेनिया यात्रा के दौरान भी दोनों देशों के शीर्ष अधिकारियों के बीच इन विषयों और रक्षा सौदों पर गहन चर्चा हुई थी।

    जैमिंग-रोधी क्षमता और किफायती लागत से प्रभावित हुआ सऊदी अरब, पश्चिमी विमानों पर एकीकरण की उम्मीद

    सऊदी अरब की वायुसेना में मुख्य रूप से अमेरिकी और ब्रिटिश लड़ाकू विमान शामिल हैं, लेकिन अस्त्र मिसाइल की किफायती लागत और इसकी बेजोड़ जैमिंग-रोधी तकनीक ने रियाद का ध्यान अपनी ओर मजबूती से खींचा है। सऊदी अरब अपने रक्षा आयात को किसी एक देश पर निर्भर रखने के बजाय विविध बनाना चाहता है। यदि अस्त्र मिसाइल का सफल एकीकरण सऊदी अरब के एफ-15 और यूरोफाइटर टाइफून जैसे पश्चिमी लड़ाकू विमानों पर हो जाता है, तो यह भारतीय रक्षा उद्योग और निर्यात क्षमताओं के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि मानी जाएगी।

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