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    विशुद्धि ही आत्मकल्याण की सीढ़ी, प्रसिद्धि नहीं धर्म और अहिंसा से रखें जुड़ाव : मुनिश्री सौम्यसागर

    प्रवचन में विशुद्धि, अहिंसा और सामायिक के महत्व पर दिया संदेश, जल छानने के पीछे जीव रक्षा का बताया वास्तविक उद्देश्य

    अलवर। परम पूज्य मुनिश्री सौम्यसागर जी महाराज ने अपने प्रवचन में कहा कि विशुद्धि ही आत्मकल्याण की वास्तविक सीढ़ी है। विशुद्धि उत्थान का कारण है, जबकि संक्लेश पतन का कारण बनता है। उन्होंने कहा कि जब जीव विशुद्धि को धारण करता है, तभी उसके शुभ कर्मों का फल पल्लवित होता है। चारों कषाय संक्लेश के मूल कारण हैं और इनके रहते आत्मोन्नति संभव नहीं है।

    मुनिश्री ने कहा कि यदि जीवन में किसी से जुड़ाव रखना है तो वह विशुद्धि, धर्म और अहिंसा से होना चाहिए, प्रसिद्धि से नहीं। उन्होंने कहा कि प्रसिद्धि कई बार विशुद्धि में बाधक बन जाती है, जबकि धर्म और अहिंसा आत्मा को निर्मल बनाने का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

    उन्होंने कहा कि जिसका अंतर्मन पवित्र और आत्मा का निवास स्थल निर्मल हो, वास्तव में वही सच्चा मनुष्य है। सामायिक का वास्तविक उद्देश्य मन को स्थिर और शांत करना है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे सामायिक के दौरान यदि किसी मुनिराज पर वस्त्र डाल दिया जाए तो वे उसे उपसर्ग मानकर स्वीकार नहीं करते, उसी प्रकार गृहस्थ को भी सामायिक करते समय यह भाव रखना चाहिए कि शरीर पर धारण किए वस्त्र भी उपसर्ग के समान हैं। ऐसा भाव विकसित होने पर गृहस्थ सामायिक शिक्षा व्रत के माध्यम से मुनि जीवन की ओर अग्रसर होता है तथा महिलाओं में आर्यिका बनने की भावना का उदय होता है।

    मुनिश्री ने स्पष्ट किया कि इन सभी आध्यात्मिक साधनाओं का मूल आधार अहिंसा है। अहिंसा के बिना विशुद्धि और आत्मकल्याण की साधना पूर्ण नहीं हो सकती।

    उन्होंने जल छानने की परंपरा का वास्तविक उद्देश्य भी समझाते हुए कहा कि पानी छानना केवल एक धार्मिक औपचारिकता नहीं है, बल्कि उसमें रहने वाले सूक्ष्म जीवों की रक्षा करना इसका मूल उद्देश्य है। प्रत्येक धार्मिक आचरण के पीछे जीवदया और अहिंसा की भावना निहित है।

    प्रवचन के दौरान श्रद्धालुओं ने मुनिश्री के उपदेशों को श्रद्धापूर्वक श्रवण किया और आत्मशुद्धि, अहिंसा तथा धर्ममय जीवन अपनाने का संकल्प लिया।

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