उज्जैन: धार्मिक नगरी उज्जैन के विश्व प्रसिद्ध हरसिद्धि माता मंदिर में शारदीय नवरात्रि के पावन पर्व को लेकर सभी तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। नौ दिनों तक चलने वाले इस आस्था और उल्लास के महान पर्व पर देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु माता के दर्शन करने और अपनी मनोकामनाएं पूरी करने की आस लेकर उज्जैन पहुंचेंगे। देश के 51 शक्तिपीठों में शुमार इस पवित्र मंदिर में नवरात्रि के दौरान विशेष पूजा-अर्चना, माता का भव्य श्रृंगार, नवचंडी पाठ और हवन-पूजन के विशेष आयोजन संपन्न होंगे।
मंदिर प्रशासन और पुजारियों ने जानकारी दी है कि इस बार नवरात्रि पर्व 11 से 19 अक्टूबर तक मनाया जाएगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, रविवार से शुरू हो रहे इस नवरात्रि पर्व पर माता रानी का आगमन 'हाथी' की सवारी पर हो रहा है, जिसे देश और समाज के लिए सुख-समृद्धि, खुशहाली और आर्थिक प्रगति का बेहद शुभ संकेत माना जाता है।
महाकाल मंदिर के पास स्थित है यह दिव्य शक्तिपीठ
माता हरसिद्धि का यह प्राचीन मंदिर उज्जैन में स्थित प्रसिद्ध महाकाल मंदिर से महज 500 मीटर की दूरी पर है, जिसे शिव और शक्ति के मिलन का एक अत्यंत दिव्य स्थान माना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब भगवान शिव माता सती के पार्थिव शरीर को लेकर ब्रह्मांड में भ्रमण कर रहे थे, तब भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र से माता सती की कोहनी इसी महाकाल वन क्षेत्र में गिरी थी, जिसके परिणामस्वरूप यहां इस महान शक्तिपीठ की स्थापना हुई। इसके अलावा, महान सम्राट विक्रमादित्य और प्राचीन महाकवि कालिदास की आराध्य देवी भी मां हरसिद्धि ही थीं।
नवरात्रि के नौ दिनों तक नहीं होगी शयन आरती
नवरात्रि के पहले दिन घटस्थापना के साथ ही सुबह 5:00 बजे से रात 11:00 बजे तक भक्तजन माता के दर्शन कर सकेंगे। उत्सव के दौरान प्रतिदिन सुबह 7:00 बजे मंगला आरती और शाम 7:00 बजे संध्या आरती का आयोजन किया जाएगा। हालांकि, नौ दिनों तक चलने वाली रात्रिकालीन विशेष साधना और अनुष्ठानों के महत्व को देखते हुए इस अवधि में शयन आरती नहीं की जाएगी। इसके अलावा, गर्भगृह में पांच कलशों की स्थापना कर रोजाना नवचंडी पाठ और विशेष हवन होगा, जहाँ श्रद्धालु माता के दिव्य रजत मुखौटे के दर्शन का लाभ प्राप्त कर सकेंगे।
2000 साल पुराने 51 फीट ऊंचे दीप स्तंभों की अलौकिक परंपरा
हरसिद्धि मंदिर की सबसे अनूठी और मुख्य पहचान यहां परिसर में स्थापित लगभग 2000 साल पुराने दो विशाल दीप स्तंभ हैं। मंदिर प्रशासन के अनुसार, 51 फीट ऊंचे इन दोनों स्तंभों में कुल 1,011 दीपक सुशोभित हैं, जिन्हें प्रज्वलित करने में करीब 60 लीटर तेल और 4 किलोग्राम रुई की बत्तियों का उपयोग होता है। स्थानीय जोशी परिवार पिछले 100 वर्षों से अपनी जान जोखिम में डालकर इन ऊंचे स्तंभों पर चढ़कर इन दीपों को जलाने की इस ऐतिहासिक परंपरा को पूरी निष्ठा के साथ निभा रहा है। शाम की आरती के समय जब ये सभी दीपक एक साथ प्रज्वलित होते हैं, तो पूरा मंदिर परिसर अलौकिक प्रकाश से जगमगा उठता है।
31 दिसंबर तक दीप जलाने की बुकिंग फुल, भक्तों में भारी उत्साह
मंदिर के इन प्रसिद्ध दीप स्तंभों पर व्यक्तिगत दीप प्रज्वलित करवाने के लिए भक्तों में इतनी भारी होड़ रहती है कि इस वर्ष 31 दिसंबर तक की सभी बुकिंग पहले ही पूरी तरह फुल हो चुकी हैं। आगामी वर्ष 2027 के लिए नई बुकिंग इस साल दिसंबर माह से शुरू होगी। हालांकि, इस नवरात्रि के पावन अवसर पर श्रद्धालु मात्र 3,100 रुपए की रसीद कटवाकर सामूहिक दीप प्रज्वलन कार्यक्रम में सहभागिता कर सकते हैं। इसके साथ ही, नौ दिनों तक भक्तों के सहयोग से मंदिर परिसर में प्रतिदिन संध्याकाल में साबूदाने की खिचड़ी और फरियाली खीर का महाप्रसाद भी वितरित किया जाएगा।


