More
    Homeदुनियाईरान की पहाड़ियों में छिपा है रहस्यमयी सांप, अपनी खासियत से बना...

    ईरान की पहाड़ियों में छिपा है रहस्यमयी सांप, अपनी खासियत से बना पहेली

    तेहरान। ईरान के दुर्गम और पथरीले पहाड़ों में पाई जाने वाली एक अनोखी सांप प्रजाति के रहस्यों से 56 साल बाद पर्दा उठा है। वैज्ञानिक रूप से ‘स्यूडोसेरास्टेस उरारैक्नोइड्स’ और आम भाषा में ‘स्पाइडर-टेल्ड हॉर्न्ड वाइपर’ कहे जाने वाले इस सांप की पूंछ दुनिया भर के शोधकर्ताओं के लिए हमेशा से कौतूहल का विषय रही है। यह सांप अपनी पूंछ के दम पर उड़ते हुए पक्षियों को अपना शिकार बनाता है।

    मकड़ी जैसी दिखने वाली पूंछ का रहस्य

    इस सांप की पूंछ का सिरा बिल्कुल एक जीवित मकड़ी की तरह दिखाई देता है। जब यह सांप पत्थरों के बीच खुद को छिपाकर अपनी पूंछ को हिलाता है, तो आसमान में उड़ते पक्षी उसे कीड़ा समझकर उस पर झपट्टा मारते हैं, और उसी क्षण सांप उन्हें अपना निवाला बना लेता है। हाल ही में अमेरिका के शिकागो स्थित फील्ड म्यूजियम और पोलिश एकेडमी ऑफ साइंसेज के वैज्ञानिकों ने इस सांप के 56 साल पुराने ऐतिहासिक नमूने (स्पेसिमेन) का पहला 3डी एक्स-रे स्कैन किया है।

    शोधकर्ताओं को अंदेशा था कि मकड़ी जैसी अनूठी बनावट देने के लिए पूंछ के भीतर हड्डियों का कोई खास ढांचा होगा, लेकिन स्कैन में पूंछ के अंदर कोई भी असामान्य हड्डी नहीं पाई गई। इससे यह स्पष्ट हो गया कि पूंछ की यह अद्भुत बनावट केवल बाहरी त्वचा और ऊतकों का कमाल है।

    1968 में पकड़ा गया था पहला नमूना

    इस दुर्लभ सांप का इतिहास काफी दिलचस्प रहा है। वर्ष 1968 में शिकागो के फील्ड म्यूजियम की एक शोध टीम ने ईरान में एक अभियान के दौरान इस सांप को पकड़ा था। हालांकि, उस समय वैज्ञानिकों ने इसे फारसी सींग वाले वाइपर की ही एक असामान्य प्रजाति मान लिया और म्यूजियम के संग्रह में रख दिया।

    फील्ड म्यूजियम की वैज्ञानिक सारा रूएन के अनुसार, उस दौर में शोधकर्ताओं को लगा था कि सांप की पूंछ के सिरे पर कोई ट्यूमर या बीमारी है। इस गलतफहमी के कारण यह दुर्लभ नमूना लगभग साढ़े तीन दशकों तक म्यूजियम के शेल्फ पर सुरक्षित रखा रहा।

    वर्ष 2006 में दर्ज हुई नई प्रजाति

    इस रहस्य से पर्दा तब उठा जब वर्ष 2003 में वैज्ञानिकों को ईरान में ठीक वैसी ही मकड़ी जैसी पूंछ वाला एक और सांप मिला। इसके बाद शुरू हुए गहन अध्ययन के आधार पर वर्ष 2006 में इसे एक बिल्कुल नई प्रजाति के रूप में आधिकारिक तौर पर दर्ज किया गया। अब 56 साल बाद हुए इस आधुनिक 3डी स्कैन ने आखिरकार उस पुरानी पहेली को पूरी तरह सुलझा दिया है।

    latest articles

    explore more

    LEAVE A REPLY

    Please enter your comment!
    Please enter your name here