रायपुर। आज देश और प्रदेशभर में बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक पावन पर्व विजयादशमी बेहद हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है। इस विशेष अवसर पर सुबह के समय विधि-विधान से शस्त्रों की पूजा की जाती है और संध्या के समय रावण दहन का कार्यक्रम संपन्न होता है। आज हम आपको राजधानी रायपुर के एक ऐसे अनोखे और रहस्यमयी मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं, जो सालभर में केवल एक ही दिन यानी विजयादशमी के पावन अवसर पर श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए खुलता है। इस दिन विशेष रूप से पंडित जी द्वारा मंदिर के कपाट खोले जाते हैं और यहां मौजूद लगभग एक हजार वर्ष पुराने प्राचीन शस्त्रों की भव्य पूजा-अर्चना की जाती है।
साल में सिर्फ एक दिन खुलता है प्रसिद्ध कंकाली मठ
दशहरे के इस खास दिन पर माता के दर्शन करने के लिए रायपुर के अलावा आसपास के तमाम जिलों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। सुबह छह बजे से लेकर रात्रि बारह बजे तक यहां अनवरत पूजा-अर्चना और दर्शन का सिलसिला चलता रहता है। सुबह से ही मंदिर परिसर में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ पड़ती है। रायपुर के इस ऐतिहासिक स्थल को कंकाली मठ के नाम से जाना जाता है। ऐसी गहरी धार्मिक मान्यता है कि कंकाली माता साक्षात प्रकट होकर अपने भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करती हैं और उन्हें आशीर्वाद देती हैं। इस दौरान श्रद्धालु माता को प्रसाद के रूप में सोनपत्ती अर्पित करते हैं तथा पारंपरिक पूजा सामग्री चढ़ाकर माता रानी की वंदना करते हैं। रात्रि बारह बजे के पश्चात मंदिर के कपाट आगामी एक वर्ष के लिए पुनः बंद कर दिए जाते हैं, जो अब अगले साल विजयादशमी के दिन ही खोले जाएंगे।
प्राचीन परंपरा और नागा साधुओं से जुड़ा इतिहास
इस मंदिर में मां आदिशक्ति के स्वरूप कंकाली माता की आराधना की जाती है। विजयादशमी के पावन पर्व पर मंदिर के भीतर प्राचीन शस्त्रों की विशेष पूजा का विधान है, जिसके पश्चात आम जनमानस को देवी के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त होता है। आम तौर पर सभी मंदिर प्रतिदिन दर्शन के लिए खुले रहते हैं, परंतु कंकाली मंदिर की यह अनूठी विशेषता है कि यहां केवल दशहरा के दिन ही ताले खुलते हैं और पूजा होती है। मंदिर के महंत के सुपुत्र एवं पुजारी अभिजीत गिरी ने जानकारी साझा करते हुए बताया कि प्राचीन काल में इस कंकाली मठ की देखरेख और संचालन नागा साधुओं द्वारा किया जाता था। इसके पश्चात, वर्ष 1980 में नागा साधुओं ने इस पवित्र मंदिर की जिम्मेदारी महंत शंकर गिरी को सौंप दी थी, जिन्होंने बाद में इसी मंदिर के प्रांगण में जीवित समाधि ले ली थी।


