श्रावण मास भगवान शिव की आराधना का प्रमुख महीना माना जाता है. अब श्रावण अपने अंतिम चरण में है तो शिव मंदिरों में भक्तों की भीड़ और आस्था भी बढ़ती जा रही है. तो वही खरगोन जिले में भगवान शिव का एक ऐसा प्राचीन मंदिर भी है, जहां की परंपरा बाकी शिव मंदिरों से बिल्कुल अलग है. यहां न तो शिवलिंग के सामने नंदी है और न ही पास में माता पार्वती की प्रतिमा. उनकी जगह मां नर्मदा की मूर्ति विराजित है. यही विशेषता मंदिर को लेकर लोगों की जिज्ञासा बढ़ाती है. कहा जाता है कि यह दुनिया का पहला मंदिर है जहां शिव की मूर्ति नहीं अपितु शिवलिंग के रूप में पूजा हुई थी
यह अनोखा मंदिर नर्मदा नदी के किनारे बसे पवित्र नगर मंडलेश्वर में स्थित है. गुप्तेश्वर महादेव मंदिर देखने में बहुत भव्य नहीं है और यहां दूसरे बड़े मंदिरों की तरह हमेशा भीड़ भी नहीं रहती. यही वजह है कि श्रद्धालु यहां शांत माहौल में भगवान के दर्शन और जलाभिषेक कर पाते हैं. मंदिर की सबसे खास बात यह है कि भगवान शिव एक छोटी और संकरी गुफा में विराजित हैं. गुफा का रास्ता इतना संकरा है कि एक समय में एक ही व्यक्ति अंदर प्रवेश कर सकता है.
दुनिया के पहले शिवलिंग की मान्यता
कहते है कि यहां विराजित शिवलिंग आदि शिवलिंग है. स्थानीय किवदंती के अनुसार, इसी स्थान से शिवलिंग पूजा की परंपरा की शुरुआत हुई थी. मान्यता है कि स्वयं भगवान शिव और माता पार्वती ने यहां शिवलिंग की स्थापना की थी. इसी वजह से गुप्तेश्वर महादेव मंदिर को श्रद्धालु बेहद प्राचीन और पवित्र मानते हैं और श्रावण मास में यहां दूर-दूर से भक्त गुफा में विराजित भगवान गुप्तेश्वर महादेव के दर्शन कर जलाभिषेक करने पहुंचते हैं.
दारुक वन में हुई थी यह घटना
मंदिर के पुजारी परमानंद केवट बताते हैं कि उनके गुरु चंदनपुरी महाराज (बंगाली बाबा), ने शास्त्रों और धर्म ग्रंथों का अध्ययन करने के बाद उन्हें इस स्थान की महिमा के बारे में बताया था. उनके अनुसार, प्राचीन समय में यह क्षेत्र दारुक वन के नाम से प्रसिद्ध था.किवदंती के अनुसार, एक बार भ्रमण के दौरान माता पार्वती की जिद पर भगवान शिव ने बाल रूप धारण किया और ऋषियों की तपस्या भंग करने के लिए नृत्य करने लगे. भगवान शिव के बाल रूप को देखकर ऋषियों की पत्नियां आकर्षित हो गईं. इससे ऋषियों की तपस्या भी भंग हो गई.
इस घटना से ऋषि काफी क्रोधित हो गए और उन्होंने भगवान शिव को श्राप दे दिया. श्राप के प्रभाव से भगवान शिव का लिंग भूमि पर गिरकर विलुप्त हो गया. बाद में जब ऋषियों को पता चला कि उन्होंने स्वयं भगवान शिव को श्राप दे दिया है तो उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ. इसके बाद उन्होंने ही इस स्थिति से मुक्ति का उपाय बताया.
नर्मदा से निकले पत्थर से शिवलिंग की स्थापना
इसके बाद भगवान शिव और माता पार्वती ने ऋषियों के कहे अनुसार, पास बह रही नर्मदा नदी से एक पवित्र पत्थर निकाला. इसी पत्थर को उस स्थान पर स्थापित किया गया, जहां शिवलिंग भूमि में समा गया था. इसके बाद ऋषियों की पत्नियों ने उस शिवलिंग की पूजा की. मान्यता है कि इसी घटना के बाद शिवलिंग की पूजा की परंपरा शुरू हुई और शिव को पुनः लिंग प्राप्त हुआ.
इसलिए नहीं है नंदी और पार्वती की प्रतिमा
गुप्तेश्वर मंदिर की सबसे अलग पहचान भी इसी किवदंती से जुड़ी मानी जाती है. बताया जाता है कि जिस समय यह घटना हुई, उस समय नंदी यहां मौजूद नहीं थे. इसलिए मंदिर में भगवान शिव के सामने नंदी की प्रतिमा स्थापित नहीं की गई. पार्वती की जगह यहां मां नर्मदा की प्रतिमा विराजित होने के पीछे धार्मिक मान्यता है कि, नर्मदा को भगवान शिव की पुत्री माना जाता है और नर्मदा नदी से ही पवित्र पत्थर लेकर भगवान शिव और माता पार्वती ने यहां शिवलिंग के रूप में स्थापित किया था. इसलिए मंदिर में मां नर्मदा की मौजूदगी को विशेष महत्व दिया जाता है.
कुंड से पूरे साल बहता रहता है जल
मंदिर की एक और खास बात यहां एक पवित्र कुंड मौजूद है. इस कुंड में मां नर्मदा का जल निरंतर बहता रहता है. इसी जल से भगवान गुप्तेश्वर महादेव का जलाभिषेक श्रद्धालुओं द्वारा होता रहता है. यही कारण है कि श्रद्धालु इस स्थान को नर्मदा और भगवान शिव के अनोखे मिलन का प्रतीक भी मानते हैं.


