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    भट्ठी बना यूपी का बांदा: हरियाली खत्म, नदियां सूखी, खनन से बढ़ी गर्मी

    बांदा। उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड अंचल का बांदा जिला इन दिनों रिकॉर्डतोड़ और जानलेवा गर्मी की चपेट में आकर पूरी तरह तप रहा है। बीते चार दिनों से यह शहर पूरे भारत के सबसे गर्म स्थानों में शीर्ष पर बना हुआ है। हाल ही में यहाँ का अधिकतम तापमान 48 डिग्री सेल्सियस के स्तर को पार कर गया, जिससे आम जनजीवन पूरी तरह पटरी से उतर चुका है। चिलचिलाती धूप और गर्म थपेड़ों (लू) के कारण दोपहर के वक्त शहर की सड़कों और बाजारों में पूरी तरह सन्नाटा पसर जाता है। पर्यावरणविदों का साफ कहना है कि यह केवल मौसम का सामान्य बदलाव नहीं है, बल्कि सालों से प्रकृति के साथ खिलवाड़, पेड़ों की बेतरतीब कटाई और अवैध खनन का खौफनाक परिणाम है।

    खनन के चलते गायब हुए पहाड़, शापित हुआ शहर

    बुंदेलखंड क्षेत्र के प्रख्यात पर्यावरण कार्यकर्ता और पद्मश्री उमाशंकर पांडेय ने इस प्राकृतिक संकट पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने बताया कि बांदा की खनिज संपदा पर खनन माफिया की क्रूर नजर लगी हुई है:

    • यहाँ की नदियों और पहाड़ों से प्रतिदिन लगभग दस हजार ट्रक बालू (रेत) और इतनी ही मात्रा में गिट्टी का अंधाधुंध दोहन किया जा रहा है। कभी बंबेश्वर पर्वत की गोद में सुरक्षित माने जाने वाले बांदा का अस्तित्व तो बचा है, लेकिन ऐतिहासिक बंबेश्वर पहाड़ अब पूरी तरह गायब होने की कगार पर है।

    • उन्होंने अपनी यादों को साझा करते हुए बताया कि पिछले पांच दशकों में उन्होंने कभी अप्रैल-मई के महीने में ऐसी रूह कंपाने वाली गर्मी नहीं देखी। बांदा कभी अपने बेहतरीन भूजल स्तर और कुओं की प्रचुरता के लिए विख्यात था, जहां जलस्रोतों के नाम पर बस्तियां बसी थीं।

    • शुक्ला कुआं, गोरहा कुआं, प्रागी तालाब और नवाब साहब तालाब जैसे मोहल्ले इसके जीवंत उदाहरण हैं। आज विडंबना यह है कि इन इलाकों से पानी और हरियाली दोनों का नामोनिशान तेजी से मिट रहा है।

    गर्मी के जाल (हीट ट्रैप) में फंसा जिला

    भौगोलिक दृष्टिकोण से बांदा कर्क रेखा के बेहद करीब स्थित है, जिसके कारण यहाँ सूर्य की किरणें सीधे और अत्यधिक तीखी पड़ती हैं। अतीत में यहाँ के घने जंगल, नदियां, कुएं और तालाब इस भीषण सौर ताप को सोखकर पर्यावरण में संतुलन बनाए रखते थे।

    इस क्षेत्र पर लंबे समय तक शोध करने वाले पर्यावरणविद राम बाबू तिवारी का कहना है कि लगातार गिरते वाटर लेवल और जलस्रोतों के सूखने की वजह से पूरा जिला एक तंदूर की तरह तप रहा है। बांदा अब एक 'हीट आइलैंड' (ऐसा कंक्रीट और सूखा क्षेत्र जो आसपास के इलाकों से काफी गर्म होता है) में तब्दील हो चुका है।

    सूख चुकी हैं नदियां, तीन हजार कुएं पड़े खाली

    पर्यावरणविदों के आंकड़ों के अनुसार, कभी इस सूखे क्षेत्र की जीवनदायिनी कही जाने वाली 'बाधैन नदी' का जलप्रवाह अब नाममात्र का रह गया है, जबकि 'रंज नदी' पूरी तरह मरुस्थल बन चुकी है। बांदा के दायरे में आने वाली कम से कम 10 छोटी और सहायक नदियां अब इतिहास का हिस्सा बन चुकी हैं। पूरे जिले में करीब तीन हजार कुएं पूरी तरह सूख चुके हैं, जिनमें नरैनी, गिरवां और छिल्ला जैसे ग्रामीण इलाके सबसे ज्यादा पानी की त्राहि-त्राहि झेल रहे हैं। इसके साथ ही, पड़ोसी जिले महोबा के चुकाबरई क्षेत्र में चल रहीं लगभग 300 क्रशर मशीनें चौबीसों घंटे पहाड़ों का सीना छलनी कर रही हैं, जिसका सामूहिक असर पूरे बुंदेलखंड की जलवायु पर पड़ रहा है।

    वन क्षेत्र का कड़वा सच (फैक्ट फाइल)

    सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, बांदा के कुल 105 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रफल में अब केवल महज तीन प्रतिशत (3%) हरित क्षेत्र (ग्रीन कवर) शेष रह गया है। बुंदेलखंड के अन्य पड़ोसी जिलों की तुलना में यह बेहद शर्मनाक और डराने वाला आंकड़ा है। उदाहरण के तौर पर चित्रकूट में लगभग 18 प्रतिशत, ललितपुर में 11.5 प्रतिशत और झांसी में करीब छह प्रतिशत वन क्षेत्र मौजूद है। हरियाली के इस भारी अभाव ने बांदा की प्राकृतिक शीतलता को पूरी तरह खत्म कर दिया है।

    प्रशासन और जनता नहीं चेती, तो आगे मरुस्थल बनेगा बांदा

    जानकारों का मानना है कि यदि अब भी कड़े कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले साल और भी ज्यादा भयावह होंगे। इस संकट से निपटने के लिए वन विभाग, सिंचाई विभाग, उद्यान विभाग, पीडब्ल्यूडी और केंद्रीय जल आयोग को एक मंच पर आकर एक आपातकालीन और ठोस कार्ययोजना तैयार करनी होगी। बड़े पैमाने पर स्थानीय पौधों का रोपण, वर्षा जल संचयन (वाटर हार्वेस्टिंग), पारंपरिक तालाबों व कुओं का जीर्णोद्धार और पहाड़ों व नदियों में अवैध खनन पर पूरी तरह पूर्ण विराम लगाए बिना बांदा को इस महासंकट से बचाना नामुमकिन है।

    हाल के वर्षों में गर्मी के टूटे रिकॉर्ड

    इसी साल 27 अप्रैल को बांदा में पारा 47.6 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया था, जो देश का सबसे गर्म दिन रहा। यह साल 1951 के बाद अप्रैल महीने का सबसे उच्चतम स्तर था। इससे पहले अप्रैल 2022 में भी तापमान 47.4 डिग्री तक गया था। हालांकि, बांदा के इतिहास का अब तक का सबसे खौफनाक और सर्वाधिक तापमान 10 जून 2019 को 49.2 डिग्री सेल्सियस रिकॉर्ड किया गया था।

    मई महीने के ताजा आंकड़े:

    • 17 मई: 46.4°C

    • 18 मई: 47.6°C

    • 19 मई: 48.2°C

    • 20 मई: 48.0°C

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