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    बंगाल में बदला चुनावी एजेंडा: नक्सलवाद की जगह विकास और नौकरी पर फोकस

    कोलकाता | सिलीगुड़ी से निकलते ही शहर की रफ्तार पीछे छूट जाती है और उत्तर बंगाल की वह जमीन शुरू हो जाती है, जहां चाय बागानों की कतारें और पहाड़ों की हल्की ढलानें रास्ते को अलग ही रंग देती हैं। एशियन हाईवे पर पहुंचते ही चुनावी माहौल साफ दिखने लगता है। सड़कों के किनारे पार्टी झंडे, दीवारों पर नारे और राजनीतिक चर्चाएं। फिर आता है भारत-नेपाल सीमा के पास बसे दार्जिंलिंग का नक्सलबाड़ी। यहीं 1967 में नक्सल आंदोलन की नींव पड़ी थी, और यहीं से उठी चिंगारी बाद में झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा, आंध्र प्रदेश समेत देश के कई हिस्सों तक फैलकर लाल गलियारा बन गया। कभी 200 से अधिक जिलों में इसका प्रभाव था, पर आज उसी जमीन पर अलग कहानी लिखी जा रही है। हाल ही में गृहमंत्री अमित शाह ने कहा कि देश अब नक्सलवाद से लगभग मुक्त हो चुका है। पर, सवाल है कि क्या यह केवल आंकड़ों की कहानी है या जमीन पर भी यही हकीकत है। अमर उजाला ने नक्सलबाड़ी की गलियों, चाय दुकानों और खेतों तक जाकर हालात को समझने की कोशिश की।

    भत्ता नहीं, नौकरी चाहिए…उद्योग आएंगे तो रुकेंगे लोग

    नक्सलबाड़ी की गलियों में अब नक्सल आंदोलन चर्चा का विषय नहीं रहा। चाय की दुकान पर बैठे बुजुर्ग हर्षवर्धन ने कहा, हमने वह दौर देखा है, पर अब सब खत्म हो चुका है। नई पीढ़ी को तो बस नाम भर पता है। यहां अब कोई लाल सलाम नहीं बोलता। अटल गांव के प्रदीप साफ कहते हैं, अब यहां सबसे बड़ा मुद्दा रोजगार है। लोग आंदोलन नहीं, काम चाहते हैं। अगर उद्योग आएंगे, तो लोग यहीं रुकेंगे। पास खड़े अजय की बात तस्वीर और साफ कर देती है कि हमें भत्ता नहीं चाहिए, नौकरी चाहिए। पढ़ाई के बाद भी अगर बाहर जाना पड़े तो क्या फायदा।स्थानीय निवासी अजीत कहते हैं, अब राजनीति विचारधारा नहीं चलती। लोग सड़क, बिजली, पानी व रोजगार देखकर वोट देते हैं। चाय बागान की सुजाता कहती हैं, अगर लखपति दीदी बनने का अवसर मिले, तो इसे कौन छोड़ना चाहेगा।

    वाम गढ़ में कमल मजबूत

    नक्सलबाड़ी की कहानी एक इलाके की नहीं, बल्कि उस बड़े बदलाव की झलक है जो देश के कई हिस्सों में दिख रहा है। कभी वामदलों के गढ़ रहे इस इलाके में उसका जनाधार तकरीबन खत्म हो चुका है। 30 वर्षों तक प्रभुत्व दिखाने वाले वामदल का वोट शेयर 2021 में सिर्फ 5 फीसदी रह गया। 2021 में भाजपा के आनंदमय बर्मन ने 58% वोट हासिल कर बड़ी जीत दर्ज की। तृणमूल उम्मीदवार राजेन सुंदास दूसरे स्थान पर रहे, जबकि कांग्रेस तीसरे स्थान पर खिसक गई। इस बार भी भाजपा ने आनंदमय बर्मन पर भरोसा जताया है, जबकि तृणमृल ने कांग्रेस से आए शंकर मलाकार को उम्मीदवार बनाया है।

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