अहमदाबाद। वर्ष 2024 के आम चुनावों में सफलता के बाद संसद के निचले सदन में प्रतिपक्ष के नेता बने राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह को साल 2027 के विधानसभा चुनावों में उनके गृह राज्य गुजरात के राजनीतिक मैदान में कड़ी शिकस्त देने की चुनौती दी थी। मगर धरातल पर भारतीय जनता पार्टी के इस अभेद्य किले में कांग्रेस पार्टी का प्रतिनिधित्व घटकर मात्र एक सांसद पर सिमट गया है। हालिया राज्यसभा चुनावों में भाजपा ने चारों सीटों पर निर्विरोध विजय हासिल कर एक नया इतिहास रचा है। गुजरात के संसदीय इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है जब उच्च सदन (राज्यसभा) में कांग्रेस का एक भी प्रतिनिधि मौजूद नहीं है और सूबे की सभी 11 राज्यसभा सीटों पर पूरी तरह भाजपा का परचम लहरा रहा है। वहीं निचले सदन (लोकसभा) की बात करें तो कुल 26 सीटों में से 25 पर भाजपा का कब्जा है और कांग्रेस के खाते में एकमात्र बनासकांठा सीट आई है, जहाँ से गेनीबेन ठाकोर निर्वाचित हुई हैं। इस तरह राज्य की कुल 37 संसदीय सीटों (26 लोकसभा और 11 राज्यसभा) में से विपक्ष की हिस्सेदारी सिर्फ एक सीट तक महदूद रह गई है।
शक्ति सिंह गोहिल के हटने से शून्य हुई संख्या, विधानसभा में भी कांग्रेस सबसे कमजोर दौर में
उच्च सदन में गुजरात से कांग्रेस के अंतिम स्तंभ शक्ति सिंह गोहिल थे, जिनका निर्धारित कार्यकाल समाप्त होते ही संसद के इस सदन में पार्टी का संख्या बल शून्य हो गया है। इस नाटकीय गिरावट के बाद राजनीतिक विश्लेषकों के बीच यह विमर्श छिड़ गया है कि मुख्य विपक्षी दल आगामी विधानसभा चुनावों में सत्ताधारी दल का सामना किस रणनीति के साथ करेगा, क्योंकि साल 2022 के प्रांतीय चुनावों में आम आदमी पार्टी की मौजूदगी के कारण कांग्रेस महज 17 सीटों पर सिमट गई थी। उस ऐतिहासिक हार के बाद पार्टी ने पहली बार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष का आधिकारिक दर्जा भी खो दिया था। चुनावों के बाद से अब तक पांच अन्य विधायकों के पाला बदल लेने के कारण 182 सदस्यीय विधानसभा में कांग्रेस के पास अब केवल 12 विधायक ही शेष बचे हैं, जबकि राहुल गांधी ने संगठन सृजन अभियान के जरिए राज्य में एक नई और आक्रामक कांग्रेस खड़ी करने का संकल्प दोहराया था।
उच्च सदन की सभी सीटों पर भाजपा का पूर्ण नियंत्रण, ये नेता संभाल रहे हैं कमान
द्विवार्षिक चुनाव के इस नए समीकरण के बाद उच्च सदन में गुजरात का प्रतिनिधित्व करने वाले सभी 11 चेहरे अब पूर्ण रूप से भाजपा के हैं। इन माननीय सदस्यों में जगत प्रकाश नड्डा, जसवन्तसिंह परमार, मयंकभाई नायक, गोविंद ढोलकिया, एस. जयशंकर, केसरीदेवसिंह झाला, बाबूभाई देसाई, रामभाई मोकारिया, रामिलाबेन बारा, नरहरि अमीन और जितेंद्र कंजरिया शामिल हैं। इस पूर्ण नियंत्रण ने राज्य की राजनीति पर सत्ताधारी दल की पकड़ को प्रशासनिक और विधायी दोनों स्तरों पर पहले से कहीं अधिक सुदृढ़ और व्यापक बना दिया है।
स्थानीय निकायों से लेकर संसद तक घटा जनाधार, वजूद बचाने के लिए बड़े संगठनात्मक फेरबदल की जरूरत
गुजरात की राजनीतिक जमीन पर मुख्य विपक्षी दल की संगठनात्मक क्षमता संसद से लेकर पंचायती राज और स्थानीय निकायों के सबसे निचले स्तर तक कमजोर हुई है। वर्तमान में सूबे के सभी 17 नगर निगमों के प्रशासनिक बोर्ड पर भाजपा का एकछत्र राज है। इस राजनीतिक संकट के बीच विशेषज्ञों का मानना है कि यदि विपक्ष को साल 2027 के विधानसभा चुनावों में सत्ता पक्ष को वास्तविक चुनौती देनी है, तो उसे राज्य में एक पूर्णकालिक संगठन मंत्री और नए प्रांतीय प्रभारी की नियुक्ति के साथ बड़े पैमाने पर सांगठनिक सर्जरी करनी होगी। वर्तमान में राज्य की कमान प्रभारी मुकुल वासनिक और प्रदेश अध्यक्ष अमित चावड़ा के हाथों में है। यदि आगामी आम चुनावों में पार्टी अपनी इकलौती बनासकांठा सीट भी कायम नहीं रख पाती, तो संसद के दोनों सदनों में उसका प्रतिनिधित्व पूरी तरह समाप्त हो जाएगा, क्योंकि इससे पहले साल 2014 और 2019 के चुनावों में सत्ताधारी दल राज्य की सभी 26 लोकसभा सीटें जीतकर क्लीन स्वीप कर चुका है।


