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    धर्म नहीं, विज्ञान भी है चैती छठ! आखिर क्यों सूर्य देव की पूजा बदल देती है इंसान की किस्मत

    जैसे ही चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की तिथियां निकट आती हैं मिथिलांचल के घर-आंगन सात्विकता और शुचिता की खुशबू से महकने लगते हैं. चैती छठ हिंदू नववर्ष के प्रारंभ में मनाया जाता है. केवल एक व्रत नहीं बल्कि आरोग्य, ऊर्जा और पारिवारिक एकता का महापर्व है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस कठिन साधना की शुरुआत कब और किसने की? दरभंगा के दो प्रसिद्ध विद्वान पंडित बलराम मिश्रा और पंडित बम-बम चौधरी ने इस महापर्व के रहस्यों की जानकारी दी.

    पांडवों के दुख दूर करने के लिए द्रौपदी ने रखा था व्रत
    पंडित बलराम मिश्रा पौराणिक कथाओं का हवाला देते हुए बताते हैं कि चैती छठ की जड़ें महाभारत काल से जुड़ी हैं. जब पांडव अज्ञातवास के दौरान कष्ट झेल रहे थे, तब माता द्रौपदी ने उनके दुखों के निवारण और परिवार के आरोग्य की कामना से सूर्य देव की कठिन उपासना की थी. माना जाता है कि यहीं से चैती छठ की परंपरा का सूत्रपात हुआ. मिथिलांचल में यह परंपरा सदियों से जीवित है. जो अब बिहार-झारखंड से निकलकर सात समंदर पार तक पहुंच चुकी है.
    आरोग्य के दाता हैं सूर्य, नहाय-खाय से पारण तक का नियम
    पंडित मिश्रा के अनुसार हिंदू नववर्ष के आरंभ में सूर्यदेव की आराधना का विशेष महत्व है. व्रत की शुरुआत नहाय-खाय से होती है. जिसमें अरवा चावल, चने की दाल और कद्दू की सात्विक सब्जी ग्रहण की जाती है. इसके बाद खरना के दिन शुद्ध गुड़-चावल का प्रसाद पाकर व्रती 36 घंटे के निर्जला उपवास में प्रवेश करते हैं. अंत में डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य देने के बाद व्रत का पारण होता है.

    वैज्ञानिक और आध्यात्मिक महत्व, सात किरणों का रहस्य
    पंडित बम-बम चौधरी इस महापर्व को वैज्ञानिक दृष्टि से समझाते हैं. उनके अनुसार छठ के दौरान सूर्य की सात किरणें मानव शरीर में प्रवेश कर नकारात्मक ऊर्जा को नष्ट करती हैं. सकारात्मक ऊर्जा का संतुलन बनाती हैं. वे कहते हैं कि सनातन धर्म में सूर्य और छठी मैया प्रत्यक्ष देव हैं. छठ करने से न केवल पापों का नाश होता है, बल्कि निरोग काया की प्राप्ति होती है. उनके अनुसार छठी मैया साक्षात मां दुर्गा का ही स्वरूप हैं. जहां षष्ठी माता और महागौरी की उपासना का संगम देखने को मिलता है.

    सामाजिक एकता का संदेश
    आज चैती छठ केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि सामाजिक बंधन का मजबूत माध्यम बन चुका है. नदी घाटों पर सजे सूप-डलिया, लोकगीतों की गूंज और एक साथ प्रसाद बांटते लोग यह संदेश देते हैं कि प्रकृति और परंपरा का संगम ही जीवन का वास्तविक आधार है. यही इस महापर्व की अमरता और लोक आस्था का अटूट प्रमाण है.

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