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    चिराग पासवान का दर्द छलका, बोले—‘2005 में जो हुआ, वो बिहार की राजनीति नहीं भूलेगी’

    पटना बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की गहमागहमी के बीच चिराग पासवान ने एक पुरानी कहानी को कुरेदकर राजद नेता तेजस्वी यादव पर हमला बोला है. चिराग ने 2005 की उस घटना का जिक्र किया जब उनके पिता और लोक जनशक्ति पार्टी (LJP) के संस्थापक रामविलास पासवान ने मुस्लिम मुख्यमंत्री बनाने की खातिर अपनी पार्टी को दांव पर लगा दिया था. लेकिन, चिराग का ये बयान अब नई बहस छेड़ रहा है, क्योंकि उनकी अपनी पार्टी ने इस बार एक भी मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया. आइए, 2025 में 2005 के इस सियासी ड्रामे को विस्तार से समझते हैं.

    2005 में हुआ क्या था?
    2005 का बिहार विधानसभा चुनाव रामविलास पासवान और उनकी पार्टी के लिए सुनहरा मौका लेकर आया था. उस वक्त एलजेपी ने कांग्रेस के साथ मिलकर तीसरे मोर्चे के तौर पर चुनाव लड़ा. रामविलास की रणनीति थी दलित और मुस्लिम वोटरों को एकजुट करना ताकि लालू प्रसाद यादव की राजद और नीतीश कुमार की जदयू-भाजपा गठबंधन को चुनौती दी जा सके. नतीजा? एलजेपी ने 29 सीटें जीतकर अपनी सबसे बड़ी कामयाबी हासिल की, जिसमें दो मुस्लिम विधायक भी शामिल थे. लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई.

    विधानसभा में कोई भी गठबंधन बहुमत तक नहीं पहुंच सका. राजद को 75 और एनडीए को 92 सीटें मिलीं, पर 122 का जादुई आंकड़ा किसी के पास नहीं था. रामविलास ने मुस्लिम मुख्यमंत्री बनाने की शर्त रखकर न राजद का साथ दिया, न एनडीए का. नतीजतन, बिहार में राष्ट्रपति शासन लग गया. लेकिन नीतीश कुमार ने चाल चली. उन्होंने एलजेपी के 12 विधायकों को तोड़ लिया, जिनमें रामविलास के भाई पशुपति कुमार पारस भी शामिल थे. इन बागियों को जदयू ने दोबारा चुनाव में टिकट का लालच दिया. नतीजा? नवंबर 2005 के दोबारा चुनाव में एलजेपी सिर्फ 10 सीटों पर सिमट गई और नीतीश मुख्यमंत्री बन गए.

    चिराग का तेजस्वी पर वार
    चिराग पासवान ने 24 अक्टूबर को सोशल मीडिया पर लिखा, “2005 में मेरे पिता ने मुस्लिम मुख्यमंत्री के लिए अपनी पार्टी कुर्बान कर दी, लेकिन राजद ने उनका साथ नहीं दिया. आज भी राजद न मुस्लिम सीएम देने को तैयार है, न डिप्टी सीएम.” उनका इशारा तेजस्वी यादव की ओर था, जिन्हें महागठबंधन ने 23 अक्टूबर को सीएम चेहरा घोषित किया. 18 फीसदी मुस्लिम वोटरों को लुभाने के लिए चिराग ने ये दांव खेला. लेकिन सवाल ये है कि क्या चिराग का ये हमला उनकी अपनी साख पर सवाल नहीं उठा रहा?

    चिराग की अपनी साख पर सवाल

    चिराग खुद को पीएम नरेंद्र मोदी का ‘हनुमान’ कहते हैं और एनडीए का हिस्सा हैं. उनकी पार्टी को इस बार 29 सीटें मिली हैं, लेकिन एक भी मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया गया. इससे उनकी बात पर सवाल उठ रहे हैं. एनडीए की दूसरी पार्टियां भी इस मामले में पीछे नहीं. भाजपा 101 सीटों पर लड़ रही है, लेकिन एक भी मुस्लिम उम्मीदवार नहीं उतारा. जदयू ने 101 सीटों पर चार मुस्लिम चेहरों को टिकट दिया, जो 2020 के 18 से काफी कम है. हम और रालोसपा ने भी कोई मुस्लिम उम्मीदवार नहीं चुना.

    महागठबंधन का जवाब

    महागठबंधन में राजद ने 143 सीटों पर 16 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे हैं, जो उनकी कुल सीटों का करीब 13% है. तेजस्वी रोजगार और विकास की बात कर रहे हैं, लेकिन मुस्लिम नेतृत्व को बड़ा पद न देना उनके लिए मुश्किल खड़ी कर सकता है. दूसरी ओर, एआईएमआईएम और जन सुराज जैसी पार्टियां मुस्लिम वोटरों को लुभाने में लगी हैं.

    2025 का सियासी समीकरण

    बिहार में 6 और 11 नवंबर को दो चरणों में वोटिंग होगी, और 14 नवंबर को नतीजे आएंगे. एनडीए ‘विकसित बिहार’ का नारा दे रही है, जबकि महागठबंधन ‘जंगल राज’ के डर को खत्म करने की बात कर रहा है. बेरोजगारी, पलायन और महिलाओं का कल्याण बड़े मुद्दे हैं. चिराग की 29 सीटें फिर से ‘किंगमेकर’ की भूमिका निभा सकती हैं अगर एनडीए बहुमत से चूक गया. लेकिन मुस्लिम वोटों का बंटवारा, खासकर सीमांचल और मिथिलांचल में, एनडीए के लिए फायदेमंद हो सकता है. 2005 का वो घाव आज भी चिराग को चुभता है. उनके पिता का सपना दलित-मुस्लिम एकता का था, जो नीतीश की चालबाजी ने तोड़ दिया. लेकिन चिराग का राजद पर हमला तब कमजोर पड़ता है जब उनकी अपनी गठबंधन और पार्टी मुस्लिम नेतृत्व को आगे बढ़ाने में पीछे दिखती है. बिहार की सियासत में ये नया ड्रामा न सिर्फ पुराने जख्म खोल रहा है, बल्कि वोटरों को भी सोचने पर मजबूर कर रहा है कि असली ‘मुस्लिम हितैषी’ कौन है?

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