More
    Homeबिजनेसआईडीबीआई डील को लेकर बढ़ा विवाद, वित्त मंत्री बोलीं- कांग्रेस बैंकों का...

    आईडीबीआई डील को लेकर बढ़ा विवाद, वित्त मंत्री बोलीं- कांग्रेस बैंकों का करती थी मनमाना इस्तेमाल

    नई दिल्ली। भारतीय बैंकिंग जगत के इतिहास में अब तक के सबसे बड़े निजीकरण और विदेशी निवेश के इस बहुचर्चित फैसले को लेकर केंद्र सरकार और विपक्ष के बीच राजनीतिक सरगर्मी चरम पर पहुँच गई है। आईडीबीआई बैंक में सरकार और भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) की साठ दशमलव बहत्तर प्रतिशत रणनीतिक हिस्सेदारी कनाडा की प्रतिष्ठित फेयरफैक्स कंपनी को बेचे जाने की औपचारिक मंजूरी मिलने के उपरांत वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी आमने-सामने आ गए हैं। जहां एक ओर राहुल गांधी ने इसे मुनाफा अर्जित करने वाले सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक का सौदा करार देते हुए राष्ट्रीय संपत्तियों को नुक़सान पहुँचाने का गंभीर आरोप लगाया है, वहीं दूसरी ओर वित्त मंत्री ने कड़ा पलटवार करते हुए कांग्रेस के पिछले शासनकाल की 'फोनबुक बैंकिंग' प्रणाली और राजनीतिक दबाव के चलते दिए गए डूबे कर्ज (एनपीए) को इस वित्तीय संस्थान की पिछली बदहाली का मुख्य कारण बताया है। आईडीबीआई बैंक की यह विनिवेश डील लगभग तिरेपन हजार करोड़ रुपये (साढ़े पाँच अरब डॉलर) में तय हुई है, जिसे देश के बैंकिंग सुधारों के इतिहास में एक बड़ा मील का पत्थर माना जा रहा है।

    आईडीबीआई बैंक के विनिवेश पर गरमाई राजनीति और राहुल गांधी के आरोप

    आईडीबीआई बैंक की रणनीतिक हिस्सेदारी बेचे जाने के इस कदम के विरोध में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने मुखर होते हुए बैंक कर्मचारियों के साथ अपनी एकजुटता प्रदर्शित की है। राहुल गांधी का तर्क है कि देश के सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक केवल बिक्री योग्य वस्तुएं नहीं हैं, बल्कि ये राष्ट्र निर्माण की रीढ़ और मुख्य जरिया हैं। उन्होंने पिछले वर्ष संसद भवन परिसर में बैंक कर्मियों के साथ हुई अपनी मुलाकात का स्मरण कराते हुए यह तीखा सवाल उठाया कि जब बैंक के कर्मचारियों ने अपनी कड़ी मेहनत और निष्ठा के बल पर इस संस्थान को घाटे से उबारकर मुनाफे की स्थिति में ला खड़ा किया है, तो सरकार इसे कनाडाई कंपनी फेयरफैक्स के हाथों में क्यों सौंप रही है। संसद के पटल पर भी इस मुद्दे को उठाते हुए उन्होंने सरकार से यह स्पष्ट करने की मांग की थी कि इस प्रक्रिया से बैंक के कर्मचारियों और आम जमाकर्ताओं के हितों की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाएगी, लेकिन सरकार की ओर से कोई संतोषजनक कारण नहीं बताया गया।

    वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का तीखा पलटवार और पुराने दौर का जिक्र

    कांग्रेस पार्टी के इन तमाम तीखे हमलों का जवाब देते हुए केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल के माध्यम से स्पष्ट किया कि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) के शासनकाल के दौरान सरकारी बैंकों और वित्तीय संस्थानों का इस्तेमाल किस प्रकार राजनीतिक 'व्यक्तिगत संपत्ति' की भांति किया जाता था। वित्त मंत्री ने गंभीर आरोप मढ़ते हुए कहा कि उस दौर में कांग्रेस नेतृत्व के करीबी बड़े उद्योग समूहों, जैसे वीडियोकॉन, विनसम, एबीजी शिपयार्ड और किंगफिशर को राजनीतिक दबाव के प्रभाव में आकर मनमाने ढंग से कर्ज वितरित कराने के लिए बैंक प्रबंधकों और कर्मचारियों पर भारी दबाव डाला जाता था, जो बाद में भारी-भरकम एनपीए में तब्दील हो गए। वर्ष 1976 में इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री कार्यकाल का उदाहरण देते हुए उन्होंने याद दिलाया कि तत्कालीन एसबीआई चेयरमैन आरके तलवार को संजय गांधी से जुड़ी एक कंपनी को वित्तीय नियमों में ढील देने से मना करने पर पद से हटने के लिए विवश किया गया था। सीतारमण ने कटाक्ष करते हुए कहा कि कांग्रेस के उस पुराने कार्यकाल में 'फोनबुक बैंकिंग' का चलन था, जबकि वर्तमान एनडीए सरकार के दौर में केवल पारदर्शी और विधिसम्मत बैंकिंग संचालित होती है।

    बैंक को उबारने के प्रयासों और विनिवेश के वित्तीय आंकड़े

    वित्त मंत्री के अनुसार, जब वर्ष 2014 में वर्तमान सरकार सत्ता में आई थी, तब आईडीबीआई बैंक बेहद जर्जर और दयनीय आर्थिक स्थिति में था। इसके पश्चात मोदी सरकार ने पेशेवर प्रबंधन को बढ़ावा देने, कड़े नियमों को लागू करने और पच्चीस हजार करोड़ रुपये से अधिक की पूंजी झोंककर इस बैंक को दोबारा उबारा और पटरी पर लाया। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि बैंक के पुनर्गठन और इस रणनीतिक विनिवेश की पूरी प्रक्रिया में तमाम विधिक नियमों का पूर्ण रूप से पालन किया गया है। बीते चौदह अक्टूबर को सरकार ने इसी दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए आईडीबीआई बैंक की साठ दशमलव बहत्तर प्रतिशत हिस्सेदारी कनाडा की फेयरफैक्स फाइनेंशियल होल्डिंग्स को लगभग तिरेपन हजार करोड़ रुपये में बेचने की मंजूरी दी है, जिसमें केंद्र सरकार अपनी तीस दशमलव अड़तालीस प्रतिशत हिस्सेदारी लगभग छब्बीस हजार छह सौ बीस करोड़ रुपये में तथा एलआईसी अपनी तीस दशमलव चौबीस प्रतिशत हिस्सेदारी लगभग छब्बीस हजार चार सौ चालीस करोड़ रुपये में बेचेगी। भारतीय रिजर्व बैंक की अंतिम नियामक मंजूरी मिलने के बाद चालू वित्त वर्ष के अंत तक इस बड़े सौदे के पूर्ण होने की पूरी संभावना है।

    latest articles

    explore more

    LEAVE A REPLY

    Please enter your comment!
    Please enter your name here