कोलकाता। पश्चिम बंगाल की तीन राज्य सभा सीटों पर होने वाले आगामी उपचुनाव को लेकर निर्वाचन आयोग (ईसी) द्वारा तारीखों के एलान के बाद राज्य का सियासी पारा चढ़ गया है। आगामी 24 जुलाई को होने वाले इस मतदान से ठीक पहले ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के नाम और आधिकारिक चुनाव चिन्ह को लेकर चल रहा अंदरूनी विवाद अब बेहद निर्णायक मोड़ पर आ चुका है। राज्य सभा चुनाव की प्रक्रिया शुरू होने से पहले अब चुनाव आयोग को बेहद जल्द यह तय करना होगा कि पार्टी के नाम और सिंबल पर असल दावा किस गुट का है।
विधानसभा चुनाव में हार के बाद टीएमसी में ऐतिहासिक फूट, दोनों गुट उतार सकते हैं प्रत्याशी
हालिया विधानसभा चुनाव में मिली शिकस्त के बाद ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी इस समय अपने अस्तित्व के सबसे बड़े आंतरिक संकट से जूझ रही है। पार्टी में विधानसभा से लेकर संसद तक दोफाड़ हो चुकी है। इस समय एक धड़े की कमान ऋतब्रत बनर्जी के हाथों में है, तो दूसरे हिस्से का नेतृत्व खुद ममता बनर्जी कर रही हैं। चुनावी पराजय के बाद होने जा रहा यह राज्य सभा उपचुनाव ममता बनर्जी के राजनीतिक भविष्य के लिए बेहद अहम माना जा रहा है। कयास लगाए जा रहे हैं कि दोनों ही गुट इन सीटों पर अपने अलग-अलग उम्मीदवार मैदान में उतारने की तैयारी कर रहे हैं, जिसने चुनाव आयोग के सामने यह तय करने का बड़ा धर्मसंकट खड़ा कर दिया है कि आखिर किसे टीएमसी का अधिकृत प्रत्याशी माना जाए।
सिंबल और नाम फ्रीज होने की बढ़ी संभावना, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त का बड़ा बयान
यदि नामांकन और मतदान की प्रक्रिया शुरू होने तक चुनाव आयोग किसी अंतिम निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पाता है, तो उसके पास पार्टी के नाम और 'जुड़वां फूल' चुनाव चिन्ह को अस्थायी रूप से फ्रीज करने का विकल्प मौजूद है। ऐसी स्थिति में दोनों पक्षों को अंतरिम तौर पर अलग नाम और नए प्रतीक चिन्ह आवंटित किए जा सकते हैं। इस पेचीदा मामले पर देश के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी का भी बड़ा बयान सामने आया है। उनका कहना है कि मौजूदा हालात को देखते हुए आयोग टीएमसी के पारंपरिक चुनाव चिन्ह को कुछ समय के लिए रोक सकता है और दोनों गुटों को अस्थाई नाम (जैसे TMC-A और TMC-B) देकर इस उपचुनाव में उतरने की इजाजत दे सकता है, जबकि असली हकदार का अंतिम फैसला बाद की विस्तृत सुनवाई में तय होगा।
क्या है चुनाव आयोग के फैसले के तीन मुख्य आधार और Form-22A का पेंच?
राज्य सभा के इस दंगल में राजनीतिक दलों को अपने अधिकृत एजेंट की नियुक्ति सुनिश्चित करने के लिए 'Form-22A' जमा करना होता है। यदि दोनों विरोधी गुटों की तरफ से अलग-अलग फॉर्म दाखिल किए जाते हैं, तो आयोग को वोटिंग से पहले ही यह तय करना अनिवार्य हो जाएगा कि पार्टी का असली प्रतिनिधि कौन है। आमतौर पर ऐसे मामलों में चुनाव चिन्ह (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968 के तहत निर्वाचन आयोग मुख्य रूप से तीन पैमानों पर किसी दल के असली मालिकाना हक का फैसला करता है:
पार्टी के मूल उद्देश्य और उसके सिद्धांत क्या हैं।
पार्टी के आधिकारिक संविधान की रूपरेखा क्या कहती है।
संगठन के सांगठनिक ढांचे और निर्वाचित जनप्रतिनिधियों (विधायकों/सांसदों) में किसका बहुमत है।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, इस पूरे विवाद में विधायकों और संगठन के भीतर का बहुमत परीक्षण (टेस्ट ऑफ मेजॉरिटी) सबसे निर्णायक भूमिका निभाएगा, हालांकि सिर्फ विधायी संख्या ही एकमात्र आधार नहीं होगी।
समय पर फैसला न होने से बढ़ेगी कानूनी पेचीदगी
यदि चुनाव आयोग आगामी 14 जुलाई की समयसीमा तक इस पर कोई स्पष्ट आदेश जारी नहीं कर पाता है, तो दोनों ही गुटों के प्रत्याशी टीएमसी के नाम पर ही अपना पर्चा दाखिल कर देंगे। ऐसी अराजक स्थिति पैदा होने पर रिटर्निंग ऑफिसर के पास एक या दोनों गुटों के नामांकन को खारिज करने का अधिकार होगा। यदि ऐसा होता है, तो यह राजनीतिक लड़ाई चुनाव आयोग के दफ्तर से निकलकर सीधे अदालत के दरवाजे तक पहुँच जाएगी। गौरतलब है कि राज्य सभा चुनाव में किसी भी प्रत्याशी के नामांकन के लिए कम से कम 10 विधायकों या विधानसभा की कुल सदस्य संख्या के 10 प्रतिशत प्रस्तावकों का समर्थन होना अनिवार्य है, और माना जा रहा है कि इस समय दोनों ही गुटों के पास यह आवश्यक जादुई आंकड़ा मौजूद है।


