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    रिकॉर्ड ऊंचाई से 42% टूटा क्रूड, क्या अब 60-65 डॉलर तक फिसलेगा भाव?

    नई दिल्ली। कच्चे तेल (क्रूड ऑयल) के बाजार से बड़ी राहत की खबर आ रही है। किसी ने उम्मीद नहीं की थी कि इसकी कीमतें इतनी तेजी से गिरकर 72 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर आ जाएंगी। विश्लेषकों (एनालिस्ट्स) का मानना था कि अमेरिका-ईरान तनाव खत्म होने के बाद भी कीमतों को पुराने स्तर पर लौटने में कई महीने लगेंगे। हालांकि, 25 जून को सितंबर ब्रेंट ऑयल फ्यूचर्स गिरकर 72.89 डॉलर और डब्लूटीआई (WTI) अगस्त क्रूड ऑयल फ्यूचर्स 69.36 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया। यह गिरावट क्रूड को ठीक उसी स्तर पर ले आई है, जहां वह इस विवाद की शुरुआत से पहले था।

    उच्चतम स्तर से 42% लुढ़का कच्चा तेल

    अमेरिका और ईरान के बीच इस साल 28 फरवरी को टकराव शुरू हुआ था, जिसके बाद तेल की कीमतों में भारी उछाल आया और 30 अप्रैल को यह 126 डॉलर प्रति बैरल के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया था। मौजूदा कीमतों की तुलना करें तो यह अपने उच्चतम स्तर से करीब 42 फीसदी नीचे आ चुका है। बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि यह बड़ी गिरावट भारत के लिए बहुत ही राहत भरी खबर है, क्योंकि कीमतें बढ़ने के बाद घरेलू ऑयल मार्केटिंग कंपनियों ने पेट्रोल, डीजल और गैस के दाम कई बार बढ़ाए थे।

    होर्मुज जलडमरूमध्य खुलने और सप्लाई बढ़ने का असर

    इस बड़ी गिरावट की मुख्य वजह अमेरिका और ईरान के बीच हुई डील है। इस समझौते के बाद 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' (होर्मुज जलडमरूमध्य) का अहम समुद्री रास्ता दोबारा खुल गया है, जिससे ऑयल टैंकर्स की आवाजाही फिर से शुरू हो गई है। एक्सपर्ट्स का अनुमान है कि आने वाले हफ्तों में वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की सप्लाई और बढ़ेगी, जबकि दूसरी तरफ मांग में थोड़ी नरमी के संकेत हैं। यदि सप्लाई इसी तरह बढ़ती रही और डिमांड कमजोर रही, तो क्रूड का भाव 60 से 65 डॉलर प्रति बैरल तक भी गिर सकता है।

    ईरान की तेल बाजार में वापसी और भारत-चीन पर प्रभाव

    अमेरिका ने कई दशकों के बाद अब ईरान को अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपना तेल बेचने की अनुमति दी है। विशेषज्ञों के अनुसार, युद्ध के बाद ईरान को अपने पुनर्निर्माण के लिए बड़े पैमाने पर फंड की जरूरत है, जिसे वह ज्यादा से ज्यादा तेल बेचकर पूरा करने की कोशिश करेगा। चूंकि ईरान दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादकों में से एक है और भौगोलिक रूप से भारत व चीन के काफी करीब है (जो कच्चे तेल के दुनिया के सबसे बड़े खरीदार हैं), इसलिए उसकी इस वापसी का सीधा असर वैश्विक कीमतों में नरमी के रूप में दिख रहा है।

    भारतीय अर्थव्यवस्था और रुपए को मिलेगी मजबूती

    कच्चे तेल की कीमतों में आई इस तेज गिरावट से भारत सरकार ने बड़ी राहत की सांस ली है। लंबे समय तक क्रूड के 100 डॉलर से ऊपर रहने के कारण देश का आयात बिल (इंपोर्ट बिल) काफी बढ़ गया था, जिससे डॉलर की मांग बढ़ने के कारण भारतीय रुपया भारी दबाव में आ गया था। अब तेल सस्ता होने से रुपए में सुधार के संकेत मिल रहे हैं। चूंकि भारत अपनी कुल जरूरत का 90 फीसदी कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है, इसलिए क्रूड में यह नरमी सरकारी खजाने पर दबाव कम करेगी और देश की अर्थव्यवस्था को सहारा देगी।

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