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    Homeबिजनेसईरान युद्ध के बीच कच्चा तेल उछला, $150 के पार पहुंचा भाव

    ईरान युद्ध के बीच कच्चा तेल उछला, $150 के पार पहुंचा भाव

    नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और होर्मुज में अनिश्चितता के बीच भारत के लिए कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल दर्ज किया गया है। 19 मार्च 2026 को भारतीय कच्चे तेल के बास्केट का भाव 156.29 डॉलर प्रति बैरल रहा। यह बास्केट भारतीय रिफाइनरियों में संसाधित कच्चे तेल का प्रतिनिधित्व करती है। इसमें खट्टे ग्रेड (ओमान और दुबई औसत) और मीठे ग्रेड (ब्रेंट दिनांकित) के कच्चे तेल शामिल हैं। इन दोनों का अनुपात क्रमशः 78.71 फीसदी और 21.29 फीसदी है। कच्चे तेल की कीमतें संबंधित महीने की दैनिक कीमतों का औसत होती हैं। वर्तमान महीने का औसत अब तक की कीमतों पर आधारित है। यह टोकरी भारत की ऊर्जा जरूरतों का महत्वपूर्ण संकेतक है। वैश्विक बाजार के उतार-चढ़ाव का इस पर सीधा असर पड़ता है।

    स्वीट क्रूड और सॉर क्रूड का क्या मतलब है?

    स्वीट क्रूड में सल्फर का स्तर बहुत कम होता है, 1% से भी कम। जबकि सॉर क्रूड में सल्फर की मात्रा 1-2% तक होती है । मध्यधारा की कंपनियां और रिफाइनर जो सॉर ऑयल का परिवहन, भंडारण और प्रसंस्करण करते हैं, वे जानते हैं कि सल्फर को हटाने और उत्पाद को स्वीट करने के लिए उन्हें अतिरिक्त उपचार क्षमताओं की आवश्यकता होती है।

    इंडियन बास्केट क्रूड ऑयल से आप क्या समझते हैं?

    इंडियन बास्केट क्रूड ऑयल का मतलब है, भारत द्वारा आयात किए जाने वाले अलग-अलग कच्चे तेलों की औसत कीमत। दरअसल भारत एक ही तरह का तेल नहीं खरीदता, बल्कि कई देशों (जैसे पश्चिम एशिया, अफ्रीका आदि) से अलग-अलग ग्रेड का कच्चा तेल खरीदता है। इन सभी तेलों की कीमतों को मिलाकर जो औसत मूल्य निकलता है, उसे ही इंडियन बास्केट कहा जाता है।

    इसकी कीमतों में उछाल से क्या असर पड़ेगा?

    इंडियन बास्केट क्रूड ऑयल महंगा होने का मतलब है कि भारत को कच्चा तेल खरीदने के लिए ज्यादा पैसा खर्च करना पड़ रहा है, क्योंकि देश अपनी जरूरत का अधिकांश तेल आयात करता है। इससे पेट्रोल, डीजल और एलपीजी की कीमतों पर दबाव बढ़ता है, जिससे आम लोगों की लागत बढ़ सकती है। साथ ही ट्रांसपोर्ट और उत्पादन महंगे होने से महंगाई बढ़ती है। तेल महंगा होने पर देश का आयात बिल भी बढ़ता है, जिससे विदेशी मुद्रा पर दबाव पड़ता है और रुपये की कमजोरी की आशंका रहती है। कुल मिलाकर, इसका असर सीधे आम जनता से लेकर पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।

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