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    हंसी के पीछे छिपा गहरा दर्द! जमीन के लिए हुए मां-बाप के मर्डर ने बदल दी जिंदगी

    नई दिल्ली। अपने भीतर के गहरे दुख को छिपाकर दूसरों के चेहरों पर मुस्कान बिखेरना बेहद कठिन काम है, जिसे बिरले लोग ही अंजाम दे पाते हैं। कुछ ऐसी ही दास्तां हिंदी सिनेमा की पहली महिला कॉमेडियन और मशहूर गायिका की है, जिन्होंने महज ढाई साल की मासूम उम्र में अपने माता-पिता और भाई को हमेशा के लिए खो दिया था। जमीन के एक टुकड़े के लिए उनके पूरे परिवार की बेरहमी से हत्या कर दी गई थी। बचपन से ही दुखों का पहाड़ झेलने के बावजूद उन्होंने कभी परिस्थितियों के आगे घुटने नहीं टेके और संघर्ष की बदौलत अपना नाम सिनेमा के सुनहरे इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज करा दिया। आइए जानते हैं उनके जीवन की वह झकझोर देने वाली कहानी, जिसे सुनकर किसी की भी आंखें नम हो जाएं।

    बचपन के खौफनाक मंजर से अनजान थीं उमा देवी

    यह दर्दनाक कहानी किसी और की नहीं, बल्कि उमा देवी खत्री की है, जिन्हें पूरी दुनिया 'टुनटुन' के नाम से जानती है। उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिले के एक छोटे से गांव में 11 जुलाई 1923 को जन्मीं टुनटुन का शुरुआती जीवन बेहद कष्टदायक रहा। अपनी मृत्यु से कुछ समय पहले दिए गए एक साक्षात्कार में भावुक होते हुए उन्होंने बताया था कि उन्हें अपने माता-पिता का चेहरा तक याद नहीं है, क्योंकि जब उनका कत्ल हुआ तब वह बहुत छोटी थीं। उन्होंने साझा किया था कि अलीपुर गांव में उनके भाई की हत्या के बाद, महज 4-5 साल की उम्र में उन्हें दो वक्त की रोटी के एवज में रिश्तेदारों के यहां नौकरानी के तौर पर काम करने के लिए छोड़ दिया गया था।

    23 साल की उम्र में सपनों की नगरी मुंबई का रुख

    अपने अतीत के जख्मों को पीछे छोड़ कुछ बड़ा करने के जज्बे के साथ वह 23 साल की उम्र में गांव से भागकर मायानगरी मुंबई आ गईं। वहां पहुंचकर उन्होंने सीधे विख्यात संगीतकार नौशाद अली का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने नौशाद साहब से साफ कह दिया कि वह गाना चाहती हैं और यदि उन्हें अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर नहीं मिला, तो वह समंदर में कूदकर अपनी जान दे देंगी। उनकी हिम्मत और जज्बे को देखकर नौशाद ने तुरंत उनका ऑडिशन लिया और उन्हें काम पर रख लिया। टुनटुन ने अपने सफर की शुरुआत बतौर अभिनेत्री नहीं बल्कि एक पार्श्व गायिका के रूप में की थी और साल 1946 में फिल्म 'वामाक अजरा' के लिए अपना पहला सोलो गाना रिकॉर्ड किया। इसके बाद उन्होंने वर्ष 1947 में 'अफसाना लिख रही हूं, दिल-ए-बेकरार का' जैसे कई सदाबहार और सुपरहिट गाने फिल्म इंडस्ट्री को दिए।

    संगीत के गलियारों से अभिनय की दुनिया में कदम

    समय के बदलते चक्र के साथ जब फिल्म इंडस्ट्री में लता मंगेशकर और सुमन कल्यानपुर जैसी नई आवाजों का दौर शुरू हुआ, तो टुनटुन की गायकी की चमक थोड़ी धीमी पड़ने लगी। ऐसे में उनके चुलबुले स्वभाव और गजब की कॉमिक टाइमिंग को भांपते हुए संगीतकार नौशाद ने उन्हें अभिनय के क्षेत्र में भाग्य आजमाने की सलाह दी। टुनटुन की यह दिली ख्वाहिश थी कि यदि वह पर्दे पर अभिनय करेंगी, तो सिर्फ अपने पसंदीदा अभिनेता दिलीप कुमार की फिल्म से ही करेंगी। नौशाद ने उनकी यह इच्छा दिलीप कुमार तक पहुंचाई और वे भी सहर्ष तैयार हो गए।

    दिलीप कुमार ने दिया 'टुनटुन' नाम, जो बन गया पहचान

    दिलीप कुमार ने साल 1950 में आई अपनी फिल्म 'बाबुल' में उमा देवी को एक रोल दिया। उमा देवी के मजेदार और अनोखे अंदाज को देखते हुए दिलीप कुमार ने ही उन्हें 'टुनटुन' नाम दिया था, जो आगे चलकर उनकी स्थायी पहचान बन गया। इस फिल्म के बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। दिलीप कुमार के अलावा उन्होंने गुरुदत्त जैसे महान निर्देशकों के साथ 'आर पार', 'मिस्टर एंड मिसेज', 'प्यासा' और 'नमक हलाल' जैसी बेहतरीन फिल्मों में काम करके दर्शकों के दिलों पर अपनी अदाकारी की अमिट छाप छोड़ी। 80 वर्ष की आयु में इस दुनिया को अलविदा कहने वाली टुनटुन आज भी सिनेमा प्रेमियों के दिलों में जिंदा हैं।

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