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    ट्रंप की रणनीति पर भारी मोदी की कूटनीति? अमेरिका में भी होने लगी भारत की चर्चा

    वॉशिंगटन। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया विदेश यात्राओं और भारत की बदलती कूटनीतिक रणनीति का लोहा अब अमेरिकी मीडिया भी मानने लगा है। अमेरिका के एक प्रमुख समाचार पत्र में प्रकाशित विश्लेषणात्मक रिपोर्ट में वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारत की विदेश नीति में आए बड़े बदलाव की सराहना की गई है। रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका की सख्त व्यापारिक नीतियों और ईरान संकट से उपजे ऊर्जा दबाव के जवाब में भारत ने बहुपक्षीय व लक्षित कूटनीति अपनाकर अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत सुरक्षा कवच प्रदान किया है।

    मध्य एशिया दौरा और यूरोपीय देशों के साथ ऐतिहासिक व्यापारिक समझौते

    भारत की इस आक्रामक 'इकोनॉमिक डिप्लोमेसी' के तहत उज्बेकिस्तान और किर्गिस्तान की हालिया यात्राओं के साथ-साथ SCO शिखर सम्मेलन में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ ऊर्जा व रणनीतिक साझेदारी पर गहन चर्चा हुई। वहीं, यूरोपीय देशों के साथ भारत ने कई ऐतिहासिक सौदे किए हैं:

    • जर्मनी व फ्रांस: जर्मनी से आधुनिक पनडुब्बी तकनीक तथा फ्रांस के साथ एआई (AI), सुशासन और भारतीय छात्रों के लिए वीजा समझौतों पर सहमति।

    • ब्रिटेन व यूरोपीय संघ: यूके से स्कॉच व्हिस्की पर आयात शुल्क में कटौती तथा दो दशकों से लंबित ईयू-इंडिया मुक्त व्यापार समझौते (FTA) पर ऐतिहासिक हस्ताक्षर।

    • नॉर्वे व दक्षिण कोरिया: नॉर्वे के साथ रोजगार सृजन तथा दक्षिण कोरिया के साथ जहाज निर्माण क्षेत्र में सहयोग, ताकि 2047 तक भारत दुनिया के शीर्ष 5 पोत निर्माताओं में शामिल हो सके।

    • न्यूजीलैंड: 40 वर्षों बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री की इस पहली यात्रा में समुद्री सुरक्षा व द्विपक्षीय व्यापार को दोगुना करने पर जोर दिया गया।

    वैश्विक शक्तियों के बीच संतुलन और अमेरिकी दबाव का असर

    रिपोर्ट में विशेषज्ञों के हवाले से कहा गया है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत पर भारी टैरिफ और रूसी तेल खरीद को लेकर दी गई चेतावनियों के बाद भारत ने अमेरिका पर अपनी निर्भरता कम की है। चैथम हाउस के दक्षिण एशियाई विशेषज्ञों के अनुसार, हालिया G-7 सम्मेलन में मोदी-ट्रंप मुलाकात औपचारिक रही, जिसके बाद भारत ने फ्रांस, जापान और कनाडा जैसी मध्यम व वैश्विक शक्तियों के साथ संतुलन साधने की अपनी पारम्परिक नीति को पुनर्जीवित किया है। अमेरिकी आर्थिक दबावों ने ही भारत को अपने पुराने संरक्षणवाद से बाहर निकलकर एक आक्रामक और आत्मनिर्भर वैश्विक साझेदार बनने का नया रास्ता दिखाया है।

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