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    हर माता-पिता को बच्चों में विकसित करनी चाहिए ये 5 हेल्दी हाइजीन हैबिट्स

    यहाँ बच्चों के बेहतर शारीरिक विकास और उनकी व्यक्तिगत स्वच्छता (हाइजीन) से जुड़ी इस महत्वपूर्ण जानकारी को नए शब्दों में, बिना किसी न्यूज़ चैनल के नाम के और आपके सभी निर्देशों के अनुसार रीराइट व पूरी तरह से विस्तारित किया गया है:

    बच्चों की सेहत का असली सुरक्षा कवच हैं ये 5 आदतें: बदलते मौसम में इन्फेक्शन और वायरस से बचाएगी पर्सनल हाइजीन, पैरेंट्स आज ही से डालें आदत

    नई दिल्ली। हर माता-पिता की यह दिली ख्वाहिश होती है कि उनका बच्चा हमेशा हंसता-खेलता, तंदुरुस्त और ऊर्जावान रहे। इसके लिए अक्सर घरों में बच्चों के खानपान और उनके पौष्टिक आहार (न्यूट्रिशन) पर तो पूरा ध्यान दिया जाता है, लेकिन कई बार सही हाइजीन (साफ-सफाई) की आदतों को नजरअंदाज कर दिया जाता है। बाल रोग विशेषज्ञों (पीडियाट्रिशियन) के अनुसार, बच्चों के बेहतर शारीरिक व मानसिक विकास के लिए जितना जरूरी अच्छा भोजन है, उतनी ही अनिवार्य व्यक्तिगत स्वच्छता भी है। बचपन के दिनों में सीखी और अपनाई गई साफ-सफाई की ये बुनियादी आदतें बच्चों के व्यवहार में शुमार हो जाती हैं और ताउम्र उनके साथ रहती हैं, जो उन्हें भविष्य में भी कई तरह के घातक बैक्टीरियल इन्फेक्शन, फंगल संक्रमण और खतरनाक वायरस की चपेट में आने से बचाती हैं।

    आज के इस दौर में, जब वैश्विक स्तर पर मौसम चक्र तेजी से बदल रहा है, कभी अत्यधिक गर्मी तो कभी अचानक होने वाली मानसूनी बारिश के कारण मौसमी बीमारियों और वायरल फीवर के मामले लगातार रिकॉर्ड तोड़ रहे हैं। ऐसे समय में बच्चों को पर्सनल हाइजीन के प्रति जागरूक और शिक्षित करना पहले से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है। अच्छी हाइजीन की आदतें न केवल बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्युनिटी) को प्राकृतिक रूप से फौलाद जैसी मजबूत बनाती हैं, बल्कि स्कूल, खेल के मैदान और घर जैसी सार्वजनिक व निजी जगहों पर बीमारियों के एक से दूसरे बच्चे में फैलने (कम्युनिटी स्प्रेड) के खतरे को भी न्यूनतम कर देती हैं। इसलिए, हर परिवार को बिना किसी लापरवाही के अपने बच्चों के डेली रूटीन में नीचे बताई गई इन 5 जरूरी हाइजीन आदतों को कड़ाई से शामिल करना चाहिए।

    1. भोजन ग्रहण करने से पहले और शौच के बाद हैंडवॉश की पक्की आदत

    मानव शरीर में बीमारियां फैलाने वाले लगभग 80 प्रतिशत कीटाणु (जर्म्स) हाथों के जरिए ही सीधे मुंह और पेट के रास्ते अंदर प्रवेश करते हैं। बच्चे स्वभाव से चंचल होते हैं; वे दिनभर स्कूल के डेस्क, खेल के मैदान की मिट्टी, पार्क के झूलों और घर के खिलौनों जैसी अलग-अलग अनगिनत चीजों को छूते हैं, जिससे उनके नन्हे हाथों की हथेलियों पर अदृश्य बैक्टीरिया और वायरस की एक मोटी परत जमा हो जाती है। यदि वे इसी स्थिति में बिना हाथ धोए कुछ भी खाते-पीते हैं, तो ये कीटाणु तुरंत पेट में जाकर आंतों को संक्रमित कर देते हैं, जिससे दस्त (डायरिया), उल्टी, फूड पॉइजनिंग और गंभीर वायरल बीमारियां हो जाती हैं। इसलिए बच्चों में यह आदत विकसित करें कि वे कम से कम 20 सेकंड तक किसी अच्छे हैंडवॉश या साबुन और साफ पानी से रगड़कर हाथ धोएं। उन्हें सिखाएं कि हाथों के पीछे, उंगलियों के जोड़ों के बीच, नाखूनों के अंदरूनी हिस्सों और कलाई तक अच्छी तरह सफाई करना क्यों जरूरी है।

    यह क्यों है जरूरी?

    • हाथों के माध्यम से पेट में जाने वाले हानिकारक कीटाणुओं और दस्त की समस्या पर रोक।

    • फूड पॉइजनिंग और टाइफाइड जैसे गंभीर संक्रमणों से बच्चों का बचाव।

    • बचपन से ही कीटाणुओं के विरुद्ध एक सुरक्षित घेरा तैयार करना।

    2. सुबह-शाम नियम से ओरल हाइजीन: दिन में दो बार ब्रश करना अनिवार्य

    बच्चों के दूध के दांतों और मसूड़ों की सही देखभाल उनके समग्र स्वास्थ्य की नींव होती है। अक्सर बच्चे चॉकलेट, टॉफी या मीठी चीजें खाते हैं, जिसके कण दांतों के बीच फंस जाते हैं। सुबह सोकर उठने के तुरंत बाद और रात को बिस्तर पर जाने से ठीक पहले, दिन में दो बार ब्रश करने की आदत से दांतों पर जमने वाला प्लाक, सड़न पैदा करने वाले बैक्टीरिया और गंदगी पूरी तरह साफ हो जाती है। इससे बच्चों को कैविटी (दांतों का खोखला होना), मसूड़ों में सूजन, असमय होने वाले दांत दर्द और मुंह की दुर्गंध जैसी कष्टदायक समस्याओं से ताउमय राहत मिलती है। बच्चों को कम से कम दो मिनट तक चारों तरफ घुमाकर ब्रश करने की सही तकनीक सिखाएं और कुछ भी मीठा या चिपचिपा खाने के बाद साफ पानी से कुल्ला (रिंस) करने की आदत डालें। साथ ही, बच्चों का टूथब्रश हर तीन महीने में बदलना बेहद जरूरी है।

    यह क्यों है जरूरी?

    • दांतों को कीड़ा (कैविटी) लगने और मसूड़ों की बीमारियों से सुरक्षित रखना।

    • बचपन से ही मजबूत मसूड़ों और चमकदार दांतों का विकास।

    • मुंह के भीतर पनपने वाले बैक्टीरिया को पेट में जाने से रोकना।

    3. रोजाना स्नान: धूल, पसीने और त्वचा के संक्रमण को कहें बाय-बाय

    प्रतिदिन सुबह नियम से नहाना शरीर पर चौबीस घंटे में जमा होने वाली धूल, पसीने की बदबू और हानिकारक बैक्टीरिया को पूरी तरह साफ करने का सबसे बेहतरीन तरीका है। विशेष रूप से उमस भरी गर्मियों और चिपचिपी बारिश के मौसम में बच्चों की संवेदनशील त्वचा पर घमौरियां, फंगल इन्फेक्शन और रैशेज होने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। इसलिए बच्चों को हर दिन ताजे पानी से स्नान करने के लिए प्रोत्साहित करें। नहाने के दौरान उन्हें शरीर के उन हिस्सों (जैसे गर्दन के पीछे, कान के पीछे और पैरों की उंगलियों) को अच्छी तरह साफ करना सिखाएं जहां पसीना ज्यादा जमा होता है। नहाने के बाद शरीर को एक बिल्कुल साफ और सूखे तौलिये से पोंछना भी उतना ही जरूरी है। नियमित सफाई से बच्चों की त्वचा स्वस्थ और चमकदार रहती है और वे दिनभर तरोताजा व एक्टिव महसूस करते हैं।

    यह क्यों है जरूरी?

    • त्वचा से जुड़े फंगल और बैक्टीरियल इन्फेक्शन के खतरे को खत्म करना।

    • पसीने की दुर्गंध को दूर कर शरीर को फ्रेश और ऊर्जावान बनाए रखना।

    • रक्त संचार (ब्लड सर्कुलेशन) को बेहतर कर शरीर की सुस्ती दूर करना।

    4. नाखूनों की नियमित छंटनी: छिपे हुए मैल और पेट के कीड़ों से सुरक्षा

    बच्चों के तेजी से बढ़ते नाखूनों के भीतर मिट्टी, धूल और शौच के बारीक कण बहुत आसानी से जमा हो जाते हैं, जो सामान्य रूप से हाथ धोने पर भी पूरी तरह बाहर नहीं निकलते। चूंकि बच्चों की यह आदत होती है कि वे बार-बार अपने हाथ या नाखून मुंह में डालते हैं या उन्हीं अनहाइजीनिक हाथों से सीधे भोजन उठा लेते हैं, जिससे नाखूनों में छिपा मैल सीधे पेट में चला जाता है। यह मैल पेट में कीड़े (वॉर्म्स) पैदा होने और गंभीर पेट दर्द की सबसे बड़ी वजह बनता है। इसलिए हर माता-पिता को सप्ताह में कम से कम एक बार (विशेषकर संडे के दिन) नेल कटर की मदद से बच्चों के नाखून छोटे करने चाहिए और उन्हें साफ रखना चाहिए।

    यह क्यों है जरूरी?

    • नाखूनों में जमा होने वाले हानिकारक मैल और गंदगी का पूरी तरह खात्मा।

    • पेट में कीड़े होने की समस्या और बार-बार होने वाले पेट दर्द से मुक्ति।

    • अजवायन या अन्य संक्रमणों को शरीर के भीतर फैलने से रोकने में सहायक।

    5. रेस्पिरेटरी हाइजीन: खांसते या छींकते वक्त मुंह और नाक को ढकना

    जब कोई बच्चा बिना मुंह ढके खांसता या छींकता है, तो उसके मुंह और नाक से निकलने वाली सूक्ष्म बूंदें (ड्रॉपलेट्स) हवा में कई फीट दूर तक फैल जाती हैं। इन बूंदों में मौजूद सर्दी-खांसी और इन्फ्लूएंजा के वायरस हवा में तैरते रहते हैं और आसपास मौजूद दूसरे बच्चों या परिवार के सदस्यों को तुरंत बीमार कर देते हैं। बच्चों को यह नागरिक और स्वास्थ्य बोध सिखाएं कि जब भी उन्हें छींक या खांसी आए, तो वे हमेशा अपने पास साफ रुमाल या टिश्यू पेपर रखें। यदि अचानक छींक आ जाए और रुमाल पास न हो, तो हाथ की हथेलियों के बजाय अपनी कोहनी को मोड़कर (एल्बो कफिंग) मुंह-नाक को ढकें। इस्तेमाल किए गए टिशू को तुरंत ढक्कन वाले डस्टबिन में फेंकने और उसके बाद हाथ धोने की आदत डालें। यह जिम्मेदारी भरी आदत बच्चों को स्कूल और अन्य सार्वजनिक स्थानों पर एक सजग और सुरक्षित नागरिक बनाती है।

    यह क्यों है जरूरी?

    • हवा के जरिए फैलने वाले सर्दी, जुकाम, फ्लू और वायरल संक्रमणों पर पूर्ण नियंत्रण।

    • स्कूल और घर के बाकी बच्चों को संक्रमण की चपेट में आने से बचाना।

    • सार्वजनिक स्थानों पर सामाजिक दूरी और स्वच्छता के कड़े नियमों का पालन।

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