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    मां की याचिका पर हाईकोर्ट का फैसला, बेटी की पसंद को दी अहमियत

    जोधपुरराजस्थान उच्च न्यायालय में एक ऐसा बेहद भावुक और संवेदनशील कानूनी मामला सामने आया, जिसने कानूनी मर्यादाओं के साथ-साथ पारिवारिक भावनाओं को भी झकझोर कर रख दिया। पाली जिले के सुमेरपुर क्षेत्र के तखतगढ़ की रहने वाली एक मां ने अपनी बेटी की बरामदगी और सुरक्षा की गुहार लगाते हुए हाईकोर्ट में एक बंदी प्रत्यक्षीकरण (हैबियस कॉर्पस) याचिका दायर की थी। इस याचिका पर संज्ञान लेते हुए अदालत ने पुलिस को युवती को तलाश कर कोर्ट में हाजिर करने के निर्देश दिए थे, जिसके बाद पुलिस टीम लड़की को लेकर अदालत पहुंची।

    बंद कमरे में न्यायाधीशों ने जानी युवती की इच्छा

    यह पूरा मामला वेकेशन बेंच (अवकाशकालीन विशेष खंडपीठ) के समक्ष सुनवाई के लिए सूचीबद्ध हुआ, जिसकी अध्यक्षता जस्टिस पुष्पेन्द्र सिंह भाटी और जस्टिस रेखा बोराणा कर रहे थे। अदालत परिसर में पेशी के दौरान न्यायाधीशों ने महसूस किया कि युवती अत्यधिक मानसिक तनाव, घबराहट और भावनात्मक दबाव में है। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए पीठ ने खुले कोर्ट के बजाय 'इन-कैमरा' यानी बंद कमरे में लड़की से अकेले बातचीत करने का फैसला किया, ताकि वह बिना किसी बाहरी डर या दबाव के अपना पक्ष रख सके। बंद कमरे में हुई इस बातचीत के दौरान युवती ने जजों को बताया कि उसने आर्य समाज मंदिर में कानूनी तौर पर प्रेम विवाह किया है और वह बीते तीन महीनों से तेलंगाना के हैदराबाद में अपने शौहर के साथ रह रही है। उसने दृढ़ता से कहा कि वह अपनी मर्जी से विवाह बंधन में बंधी है और अपने जीवनसाथी के साथ ही आगे की जिंदगी बिताना चाहती है।

    माता-पिता की चिंता और कोर्ट की समझाइश

    भले ही युवती अपने वैवाहिक फैसले पर अडिग थी, लेकिन अपनी बात रखते समय माता-पिता के प्रति उसका गहरा प्रेम और लगाव भी साफ नजर आया। उसने अदालत से कहा कि उसे अपने माता-पिता के स्वास्थ्य और उनकी मानसिक स्थिति की हमेशा फिक्र रहती है, परंतु वह अपने भविष्य का फैसला स्वयं लेने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है। सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने एक अभिभावक की भूमिका निभाते हुए युवती को समझाया कि जीवन के ऐसे बड़े और दूरगामी फैसले बहुत सोच-समझकर तथा परिपक्वता के साथ लिए जाने चाहिए। अदालत ने उसे एक सुरक्षित विकल्प देते हुए यह भी कहा कि यदि वह अपने इस निर्णय पर दोबारा विचार करने के लिए कुछ वक्त चाहती है, तो उसे कुछ दिनों के लिए राजकीय नारी निकेतन में सुरक्षित ठहराया जा सकता है, मगर युवती ने इस प्रस्ताव को सविनय ठुकराते हुए अपने पति के पास ही वापस लौटने की जिद दोहराई।

    आर्थिक आधार और बालिग होने के नाते मिला कोर्ट का संरक्षण

    युवती ने अपनी आर्थिक स्थिति का ब्यौरा देते हुए अदालत को आश्वस्त किया कि उसका पति हैदराबाद में कड़ी मेहनत और मजदूरी करके हर महीने लगभग 25 हजार रुपये कमा लेता है, जो उनकी आजीविका के लिए पर्याप्त है और वह उसका पूरा ख्याल रखता है। कोर्ट रूम में मौजूद माता-पिता अपनी लाडली के भविष्य और सुरक्षा को लेकर बेहद मायूस और चिंतित दिखाई दे रहे थे, लेकिन उच्च न्यायालय ने कानून का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि चूंकि युवती कानूनी रूप से बालिग है, इसलिए भारतीय संविधान के तहत उसे अपनी स्वतंत्र इच्छा से जीवनसाथी चुनने और रहने का पूरा अधिकार प्राप्त है। इसी के आधार पर हाईकोर्ट ने याचिका को निस्तारित करते हुए युवती को उसके पति के साथ जाने की मंजूरी दे दी और स्थानीय पुलिस व राज्य प्रशासन को निर्देश दिए कि नवदंपती को उनके गंतव्य तक पहुंचने और आगे सुरक्षित रहने के लिए पूरी सुरक्षा मुहैया कराई जाए।

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