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    संतान नहीं है तो कौन करेगा पिंडदान? गया के कर्मकांडी पुरोहित से जानें किसे है अधिकार

    25 सितंबर से पितृपक्ष महासंगम की शुरुआत हो रही है. बिहार के गया जी में पितृपक्ष के दौरान देश-विदेश से लाखों की संख्या में तीर्थ यात्री पहुंचेंगे और अपने पितरों का पिंडदान करेंगे. माना जाता है गयाजी के विष्णुपद में शमी वृक्ष के एक पत्ता के सामान भी अन्न का एक दाना पितरों के लिए रखते हैं तो सात गोत्र और 101 कूल का उद्धार हो जाता है.

    फल्गु नदी के तट पर पिंडदान एवं तर्पण
    मान्यता है कि फल्गु नदी के तट पर पिंडदान एवं तर्पण करने से पितरों को सबसे उत्तम गति के साथ मोक्ष की प्राप्ति होती है एवं माता-पिता समेत कुल की सात पीढ़ियों का उद्धार होता है. साथ ही पिंडदानकर्ता स्वयं भी परमगति को प्राप्त करते हैं. कई परिवारों में ऐसी स्थिति आती है जब मृत दंपति के बेटा या बेटी नहीं होते तब परिवार के लोगों के मन में सवाल रहता है कि आखिर गया जी में पिंडदान कौन कर सकता है.
    क्या कहते हैं कर्मकांड ब्राह्मण?
    गया जी के कर्मकांड ब्राह्मण चंदन कुमार कौशिक बताते हैं कि यदि किसी व्यक्ति(महिला और पुरुष) की मृत्यु हो गई और उनके संतान नहीं है, तो कई पारिवारिक एवं धार्मिक परंपराओं में पत्नी या पति द्वारा श्राद्ध कर्म करने की व्यवस्था बताई जाती है. यदि मृतक के संतान नहीं है और उसका भाई जीवित है, तो भाई द्वारा पिंडदान कराया जा सकता है.

    … तो भतीजा करेगा श्राद्ध-पिंडदान
    यदि मृतक के संतान नहीं है और भाई उपलब्ध नहीं है, तो परिवार की परंपरा के अनुसार भतीजा श्राद्ध-पिंडदान कर सकता है. परिस्थिति के अनुसार परिवार के अन्य निकट संबंधी भी कर्मकांड कर सकते हैं. कुछ परंपराओं में भांजे आदि रिश्तेदारों द्वारा भी धार्मिक कर्म कराने की व्यवस्था मिलती है. यदि परिवार में ऐसा कोई व्यक्ति उपलब्ध नहीं है जो पिंडदान कर सके, तो गया जी में पुरोहित की सहायता से संकल्प और निर्धारित विधि के अनुसार कर्म कराया जा सकता है.

    खुद का भी कर सकते हैं पिंडदान
    इन्होने बताया हिंदू धार्मिक परंपराओं में जीवित रहते अपने लिए पिंडदान करने की एक विशेष परंपरा भी मिलती है, जिसे आम तौर पर जीवित-पिंडदान या आत्म-पिंडदान कहा जाता है. हालांकि स्वयं का पिंडदान करने के बाद उन्हें कई नियमों का पालन करना आवश्यक होता है. इनकी माने तो वैसे व्यक्ति जो जीते जी गया जी में स्वयं का पिंडदान करते हैं उन्हें सांसारिक जीवन से दूर रहना पड़ेगा. किसी नदी के तट पर रहकर स्वयं से भोजन बनाना होगा. जब तक वह जीवित है तब तक इस नियम का पालन उन्हें करना होगा.

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