भोपाल। राजधानी में हर साल की तरह इस बार भी प्रतिमा विसर्जन के उपरांत जलस्रोतों की स्थिति बेहद चिंताजनक हो गई है। प्रशासन द्वारा विसर्जन के लिए दिशा-निर्देश तय किए जाने के बावजूद उनका सख्ती से पालन नहीं हुआ, जिसके चलते शहर के सातों विसर्जन कुंड केमिकल टैंक में तब्दील नजर आए। नियमानुसार मूर्तियों को कुंड में डालने के कुछ ही देर के भीतर बाहर निकाल लिया जाना चाहिए था, लेकिन लापरवाही के चलते प्रतिमाएं 10 से 12 घंटे तक पानी में ही पड़ी रहीं। प्रेमपुरा, रानी कमलापति और खटलापुरा घाटों पर बरती गई इस उदासीनता ने जलीय जीवों और पर्यावरण पर बड़ा संकट खड़ा कर दिया है।
केमिकल और टॉक्सिक रंगों से घुल रहा है पानी
पर्यावरणविद् डॉ. विपिन व्यास के अनुसार, मूर्तियों के घंटों तक पानी में डूबे रहने के कारण उनमें प्रयुक्त प्लास्टर ऑफ पेरिस (पीओपी), लेड और कैडमियमयुक्त जहरीले सिंथेटिक रंग पूरी तरह से पानी में घुल गए। ये खतरनाक रसायन पानी में ऑक्सीजन का स्तर तेजी से गिरा देते हैं, जिससे जलीय जीवों का दम घुटने लगता है। नियमों के मुताबिक विसर्जन कुंड का उपयोग केवल प्रतीकात्मक होना चाहिए और विसर्जन के 30 से 60 मिनट के भीतर मूर्तियों को सुरक्षित बाहर निकाल लेना अनिवार्य है।
प्रमुख विसर्जन घाटों की स्थिति और आंकड़े
नवमी से लेकर अब तक शहर के 7 मुख्य विसर्जन घाटों पर कुल 2,963 छोटी-बड़ी प्रतिमाओं का विसर्जन किया जा चुका है, जिनका विवरण इस प्रकार है:
प्रेमपुरा: 595 प्रतिमाएं
बैरागढ़: 451 प्रतिमाएं
हथाईखेड़ा: 310 प्रतिमाएं
रानी कमलापति: 253 प्रतिमाएं
खटलापुरा: 145 प्रतिमाएं
मालीखेड़ी: 93 प्रतिमाएं
शाहपुरा: 73 प्रतिमाएं
इस बार सबसे खराब स्थिति प्रेमपुरा घाट की देखने को मिली, जहाँ विसर्जन कुंड में 350 से अधिक मूर्तियां और उनके अवशेष जमा हो गए, जिन्हें समेटना प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। इसी तरह रानी कमलापति घाट के कुंड में 300 से अधिक मूर्तियों के ढांचे, पूजा सामग्री और बांस के फ्रेम तैरते नजर आए, जबकि खटलापुरा घाट पर भी 70 से अधिक बड़ी मूर्तियां और लगभग 200 मूर्तियों के बांस के स्ट्रक्चर पानी में तैरते दिखाई दिए।
पर्यावरण अनुकूल विसर्जन के उपाय
त्वरित निष्कासन: विसर्जन कुंड में प्रतिमा डालते ही उसे अधिकतम कुछ ही मिनटों में बाहर निकाल लिया जाए, ताकि हानिकारक रसायन पानी में न घुल सकें।
इको-फ्रेंडली सामग्री: केवल प्राकृतिक मिट्टी और गैर-हानिकारक ऑर्गेनिक रंगों से निर्मित मूर्तियों का ही उपयोग किया जाए।
वैज्ञानिक प्रबंधन: कृत्रिम कुंडों के दूषित पानी को सीधे मुख्य जल स्रोतों में मिलने से रोकने के लिए वैज्ञानिक और तकनीकी उपाय सुनिश्चित किए जाएं।


