रायपुर: छत्तीसगढ़ की राजधानी और उसके आसपास के इलाकों से सरकारी धान केंद्रों में बड़े पैमाने पर धान गायब होने का एक बेहद गंभीर मामला उजागर हुआ है। समर्थन मूल्य पर खरीदे गए धान के उठाव के बाद जब खाद्य विभाग और प्रशासन द्वारा स्टॉक का ज़मीनी (भौतिक) सत्यापन किया गया, तो कुल 12 सहकारी समितियों में धान का भारी घाटा (शॉर्टेज) देखने को मिला। गायब हुई धान की सरकारी कीमत 2 करोड़ रुपये से भी ज्यादा आंकी गई है। इस बड़ी लापरवाही और वित्तीय गड़बड़ी को देखते हुए जिला प्रशासन ने कड़ा रुख अख्तियार कर लिया है और दोषी केंद्रों के खिलाफ सीधे कानूनी शिकंजा कसना शुरू कर दिया है।
करोड़ों की चपत: क्या है पूरा समीकरण?
प्रशासनिक अधिकारियों से मिली जानकारी के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2025-26 के धान खरीदी सीजन के अंतर्गत केंद्रों से धान का उठाव मिलर्स के लिए किया गया था। उठाव पूरा होने के बाद जब रिकॉर्ड और बचे हुए स्टॉक का मिलान किया गया, तो चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए:
धान की कमी: 12 समितियों में कुल 6,590 क्विंटल धान कम पाई गई।
वित्तीय नुकसान: इस गायब धान की कुल सरकारी कीमत 2 करोड़ 17 लाख 47 हजार रुपये है।
तीन केंद्रों पर FIR: विभागीय नोटिस का संतोषजनक जवाब न देने पर खौना (धरसींवा), रखेली (अभनपुर) और छदिया (खरोरा) समितियों के खिलाफ नामजद एफआईआर (FIR) दर्ज करा दी गई है। बाकी बची 9 समितियों पर भी जल्द ही पुलिसिया कार्रवाई की तैयारी है।
कहीं धान कम तो कहीं अधिशेष (ज्यादा) का खेल
भौतिक सत्यापन की रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि खोरपा शाखा के अंतर्गत आने वाले फरफोद धान केंद्र में 734 क्विंटल और टिकारी केंद्र में 500 क्विंटल धान कम मिली। इसके विपरीत, कुछ केंद्रों में तय स्टॉक से ज्यादा धान पाकर अधिकारी भी हैरान हैं। इनमें रीवा केंद्र में 855 क्विंटल, मंदिर हसौद के टेकारी केंद्र तथा तिल्दा ब्लॉक के देवरी और लौहड़ा केंद्र में करीब 500 क्विंटल धान अतिरिक्त पाई गई है, जिसकी अलग से जांच की जा रही है।
समिति संघ का पलटवार: 'यह घोटाला नहीं, धान सूखने का नतीजा है'
दूसरी ओर, इस कड़े प्रशासनिक एक्शन के बाद धान खरीदी समितियों के संघ ने पुलिसिया कार्रवाई का पुरज़ोर विरोध किया है। छत्तीसगढ़ धान समिति के प्रांतीय अध्यक्ष नरेंद्र कुमार साहू ने इस एफआईआर को पूरी तरह गलत और एकतरफा बताया है।
समिति संघ का तर्क: संघ के पदाधिकारियों का कहना है कि यह कोई घोटाला या चोरी नहीं है, बल्कि 'मार्कफेड' (Markfed) और राइस मिलर्स द्वारा धान के उठाव में की गई देरी और लापरवाही का नतीजा है। धान हफ्तों तक खुले आसमान के नीचे और तेज धूप में पड़ी रही, जिसके चलते उसका प्राकृतिक मॉइस्चर (नमी) खत्म हो गया और वजन में भारी कमी आ गई। प्रबंधकों को बलि का बकरा बनाया जा रहा है, जबकि व्यवस्थागत खामियों के कारण वजन घटा है।


