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    सीवेज कंसल्टेंसी ठेके पर बड़ा विवाद, 14 करोड़ से बढ़कर 65 करोड़ से ज्यादा हुआ खर्च

    मुंबई। शहर के बुनियादी ढांचे से जुड़े एक पुराने मामले में कानूनी लड़ाई हारने के बाद मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) को बड़ा वित्तीय झटका लगा है। वर्ष 1995 में लगभग 14 करोड़ रुपये की लागत से दिए गए सीवेज संचालन और रखरखाव कंसल्टेंसी के एक ठेके के एवज में अब मनपा को ब्याज व जुर्माने समेत 65 करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान करना होगा। सुप्रीम कोर्ट द्वारा मनपा की याचिका खारिज किए जाने के बाद स्थायी समिति ने मजबूरी में इस भुगतान के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है।

    क्या था पूरा मामला और कैसे बढ़ा वित्तीय बोझ?

    महानगरपालिका के अनुसार, वर्ष 1995 में सीवेज निपटान व्यवस्था के संचालन और रखरखाव का विस्तृत अध्ययन करने का ठेका कनाडा की कंपनी 'आर.वी. एंडरसन एसोसिएट्स लिमिटेड' को दिया गया था, जिसमें 'पीएचई कंसल्टेंट्स' स्थानीय साझेदार थी। जून 2001 में यह काम पूरा हो गया था और इसकी गुणवत्ता को लेकर कोई विवाद नहीं था। हालांकि, कंपनियों ने लंबित भुगतानों और ब्याज की मांग को लेकर मध्यस्थता की कार्यवाही शुरू कर दी थी।

    जून 2010 में मध्यस्थता न्यायाधिकरण ने कंपनियों के पक्ष में फैसला सुनाया, जिसके खिलाफ मनपा ने बॉम्बे हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट तक लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी। लेकिन अदालतों से लगातार राहत न मिलने के कारण आखिरकार मनपा को यह भारी-भरकम राशि चुकानी पड़ रही है। बैंक खाते फ्रीज होने के खतरे को टालने के लिए मंगलवार को स्थायी समिति की बैठक में इस प्रस्ताव को पास करना पड़ा।

    स्थायी समिति ने की तीखी आलोचना और जांच की मांग

    महानगरपालिका के इस वित्तीय नुकसान को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के सदस्यों ने प्रशासन की कड़ी आलोचना की है। सदस्यों का कहना है कि इस लंबी कानूनी प्रक्रिया और लापरवाही का पूरा आर्थिक बोझ अंततः मुंबई की जनता पर पड़ रहा है।

    स्थायी समिति के अध्यक्ष प्रभाकर शिंदे ने पूरे प्रकरण की विस्तृत जांच कराने, इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करने और 15 दिनों के भीतर जांच रिपोर्ट पेश करने के कड़े निर्देश दिए हैं। इसके साथ ही, कांग्रेस और शिवसेना (यूबीटी) के पार्षदों ने भी मांग की है कि नगर आयुक्त अदालतों में लंबित अन्य बड़े वित्तीय दावों का विवरण स्थायी समिति के सामने रखें।

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