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    लोक संस्कृति को बड़ी पहचान, ‘मांदर ऑफ झारखंड’ के नाम से रजिस्टर हुआ पारंपरिक वाद्ययंत्र

    गुमला (झारखंड)। झारखंडी लोकसंस्कृति और आदिवासी परंपरा के अभिन्न प्रतीक पारंपरिक वाद्ययंत्र 'मांदर' को आधिकारिक तौर पर भौगोलिक संकेतक यानी जीआई (GI) टैग प्राप्त हो गया है। चेन्नई स्थित भौगोलिक संकेतक रजिस्ट्री द्वारा इसे 'मांदर ऑफ झारखंड' के नाम से विधिवत पंजीकृत किया गया है, जिसके पश्चात अब मांदर की थाप देश-दुनिया में अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान के साथ गूंजेगी।

    मांदर को जीआई टैग दिलाने में पूर्व उपायुक्त का विशेष योगदान

    पारंपरिक वाद्ययंत्र मांदर को यह गौरव दिलाने में गुमला के तत्कालीन उपायुक्त कर्ण सत्यार्थी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। अपने स्थानांतरण के उपरांत भी उन्होंने इस प्रयास को लगातार जारी रखा तथा मांदर को झारखंड की अनूठी सांस्कृतिक पहचान के रूप में जीआई मान्यता दिलाने की संपूर्ण प्रक्रिया में सक्रिय रूप से जुड़े रहे। लगभग पांच वर्षों के निरंतर प्रयासों, पुख्ता दस्तावेजी प्रमाणों और जटिल प्रक्रियागत चुनौतियों को पार करने के पश्चात राज्य को यह बड़ी उपलब्धि हासिल हुई है।

    जनजातीय जीवन और ऐतिहासिक साक्ष्यों से जुड़ाव

    जीआई पंजीकरण के लिए भेजे गए आवेदन में मांदर की विशिष्ट बनावट, इसके निर्माण में प्रयुक्त होने वाले स्थानीय कच्चे माल, पारंपरिक निर्माण तकनीक, इसकी अनूठी गूंज और झारखंड के जनजातीय जीवन के साथ इसके गहरे सांस्कृतिक संबंधों को पूरी प्रामाणिकता के साथ प्रमाणित किया गया। इसके समर्थन में वर्ष 1915 से 1940 के मध्य के ऐतिहासिक दस्तावेजों, विभिन्न प्रामाणिक पुस्तकों तथा पुरातात्विक अभिलेखों को मुख्य आधार बनाया गया। झारखंड में मांदर को केवल एक वाद्ययंत्र मात्र नहीं माना जाता, बल्कि यह यहां के सामुदायिक जीवन और लोक संस्कृति का एक अनिवार्य हिस्सा है। सरहुल और कर्मा जैसे महान पर्व-त्योहारों तथा पारंपरिक नृत्यों के दौरान मांदर की थाप संपूर्ण समाज को आपस में पिरोने का कार्य करती है।

    पारंपरिक कारीगरों को मिलेगी विशिष्ट पहचान और बाजार

    इस प्रतिष्ठित जीआई टैग के मिलने से मांदर का निर्माण करने वाले स्थानीय और पारंपरिक कारीगरों को अपनी कला की एक विशिष्ट वैश्विक पहचान स्थापित करने में अभूतपूर्व सहायता मिलेगी। जीआई व्यवस्था किसी भी विशिष्ट क्षेत्र से जुड़े उत्पादों की प्रामाणिकता और उनकी भौगोलिक विशिष्टता को कानूनी संरक्षण प्रदान करती है। इससे न केवल स्थानीय पारंपरिक शिल्पकला को बढ़ावा मिलता है, बल्कि बाजार में इसके विस्तार और आर्थिक सुदृढ़ता की संभावनाएं भी प्रबल होती हैं।

    झारखंड की सांस्कृतिक विरासत में एक और स्वर्णिम अध्याय

    मांदर को जीआई टैग मिलने के साथ ही राज्य की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की दिशा में एक और अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय जुड़ गया है। उल्लेखनीय है कि इससे पूर्व भी राज्य के अन्य पारंपरिक उत्पादों जैसे सोहराय-खोवर चित्रकला आदि को जीआई पहचान मिल चुकी है, जो झारखंड की कला और संस्कृति के व्यापक महत्व को रेखांकित करती है।

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