जैसलमेर। राजस्थान में आगामी पंचायती राज चुनाव 2026 की आरक्षण लॉटरी जारी होते ही जैसलमेर जिला परिषद के सियासी गलियारों में बड़ा फेरबदल देखने को मिला है। गुरुवार को घोषित लॉटरी परिणामों के तहत जैसलमेर जिला प्रमुख का पद 'अनुसूचित जनजाति (ST) ओपन' वर्ग के लिए आरक्षित घोषित कर दिया गया है। इस एकल फैसले ने जिले के दशकों पुराने स्थापित राजनीतिक घरानों की जमी जमाई बिसात को पूरी तरह उलट दिया है और चुनावी समीकरणों को नए सिरे से गढ़ने पर मजबूर कर दिया है।
पारंपरिक सियासी गढ़ ढहे, दिग्गजों की राह हुई मुश्किल
जैसलमेर की ग्रामीण राजनीति पर लंबे समय से सिंधी मुस्लिम समाज के धर्मगुरु दिवंगत गाजी फकीर और पूर्व कैबिनेट मंत्री सालेह मोहम्मद के कुनबे का गहरा असर रहा है। इसी रसूख के बल पर कांग्रेस पार्टी यहां लगातार मजबूत स्थिति में बनी रही और फकीर परिवार ने तीन बार जिला प्रमुख की कुर्सी पर अपना कब्जा जमाया। चूंकि जैसलमेर मुख्य रूप से सामान्य और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) बहुल इलाका माना जाता है, इसलिए 'ST ओपन' श्रेणी का आरक्षण लागू होते ही फकीर परिवार सहित कई बड़े पारंपरिक राजनीतिक चेहरों के लिए जिला प्रमुख बनने के सीधे दरवाजे बंद हो गए हैं।
2020 का सियासी भीतरघात और बदला इतिहास
जैसलमेर जिला परिषद की सियासत सिर्फ वर्चस्व की ही नहीं, बल्कि अंदरूनी गुटबाजी और बगावत के लिए भी चर्चित रही है। वर्ष 2020 में हुए जिला परिषद चुनाव के दौरान 21 सदस्यों वाली परिषद में कांग्रेस के पास 12 सीटों का स्पष्ट बहुमत हासिल था, जबकि भारतीय जनता पार्टी के खाते में केवल 8 सीटें थीं। लेकिन जिला प्रमुख के चुनाव वाले दिन सालेह मोहम्मद गुट और पूर्व प्रधान मूलराज सिंह धांधे गुट के बीच खींचतान चरम पर पहुंच गई। नतीजे के तौर पर कांग्रेस के 4 पार्षदों ने क्रास वोटिंग कर बगावत कर दी। इस अंदरूनी कलह का फायदा उठाकर भाजपा ने निर्दलीय के सहयोग से दो दशक बाद अपना जिला प्रमुख बनाने में सफलता हासिल की थी।
'किंगमेकर वार्ड' पर टिकी दोनों दलों की रणनीति
जैसलमेर जिले में अनुसूचित जनजाति आबादी का अनुपात बेहद सीमित है। इस कारण 21 वार्डों वाली जिला परिषद में से संभवतः केवल 1 या 2 वार्ड ही ST वर्ग के लिए आरक्षित होने के आसार हैं। ऐसे में अब दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों के लिए पूरा मुकाबला बहुमत जुटाने के साथ-साथ उस इकलौते 'जादुई ST वार्ड' को जीतने पर आकर टिक गया है। जो पार्टी इस आरक्षित सीट पर जीत हासिल करेगी, जिला प्रमुख के चेहरे का चयन भी वही दल कर पाएगा। दिग्गजों के अरमानों पर पानी फिरने के बाद अब कांग्रेस और भाजपा दोनों ही स्थानीय स्तर पर किसी प्रभावशाली और बेदाग आदिवासी चेहरे को अपने पाले में लाने की होड़ में जुट गए हैं।


