नई दिल्ली: शीत युद्ध के दौरान अमेरिका और सोवियत संघ के बीच सैन्य और विमानन तकनीक को लेकर जबरदस्त होड़ देखने को मिली। इस प्रतिस्पर्धा में दोनों देशों ने दो बिल्कुल अलग-अलग इंजीनियरिंग सोच के साथ लड़ाकू विमान तैयार किए। अमेरिका ने जहां अपने अत्याधुनिक एसआर-71 ब्लैकबर्ड (SR-71 Blackbird) में बेहद महंगे और हल्के टाइटेनियम का उपयोग किया, वहीं सोवियत संघ ने कम लागत और मजबूत बनावट वाले निकेल-स्टेनलेस स्टील को प्राथमिकता देते हुए मिग-25 'फॉक्सबैट' (MiG-25 Foxbat) का निर्माण किया।
टाइटेनियम बनाम निकेल-स्टेनलेस स्टील
एसआर-71 (अमेरिका): मैक 2.5 से अधिक की गति पर उड़ान भरते समय विमान की बाहरी सतह का तापमान 300 डिग्री सेल्सियस से ऊपर चला जाता था। इस भीषण गर्मी को सहन करने और वजन हल्का रखने के लिए टाइटेनियम चुना गया। हालांकि, इसकी तकनीक को अत्यंत गोपनीय रखा गया और अमेरिका ने इसे कभी किसी अन्य देश को नहीं सौंपा।
मिग-25 (सोवियत संघ): सोवियत इंजीनियरों ने विमान का लगभग 80 प्रतिशत ढांचा निकेल-स्टेनलेस स्टील से तैयार किया। इसमें कुछ मात्रा में टाइटेनियम और अन्य मिश्रित धातुओं का भी प्रयोग हुआ। यद्यपि स्टील टाइटेनियम की तुलना में भारी था, लेकिन इसकी लागत कम थी, बड़े पैमाने पर उत्पादन आसान था और कारखानों में मरम्मत प्रक्रिया अधिक सुविधाजनक थी।
मिग-25 की रफ्तार और तकनीकी क्षमताएं
करीब 20,000 किलोग्राम वजनी होने के बावजूद मिग-25 में लगे दो शक्तिशाली टर्बोजेट इंजनों ने इसे मैक 2.83 (ध्वनि की गति से लगभग तीन गुना) की अत्यधिक रफ्तार तक पहुंचाया। अपनी तेज गति, उच्च क्षमता और आसान रखरखाव के कारण यह अपने समय के सबसे घातक और सफल टोही विमानों में गिना गया। अमेरिका के विपरीत, सोवियत संघ ने इस तकनीक को भारत सहित अपने कई मित्र देशों के साथ साझा भी किया।
भारतीय वायुसेना और 'ऑपरेशन सफेद सागर' में भूमिका
भारतीय वायुसेना में मिग-25आर टोही विमान को वर्ष 1981 में शामिल किया गया, जिसने 2006 तक देश की रणनीतिक निगरानी में ऐतिहासिक योगदान दिया। 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान चलाए गए 'ऑपरेशन सफेद सागर' में मिग-25 ने अत्यधिक ऊंचाई से उड़ान भरकर दुश्मन की तैनाती, बंकरों, तोपों की स्थिति और रसद आपूर्ति मार्गों की सटीक जानकारियां जुटाईं। इसके अलावा, 'ऑपरेशन पराक्रम' के दौरान भी इस विमान ने भारतीय वायुसेना की जासूसी और निगरानी क्षमता को मजबूती प्रदान की।


