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    मोक्षदा एकादशी 2025: 30 नवंबर या 1 दिसम्बर, व्रत किस दिन रखें? उज्जैन के आचार्य से जानें सही तिथि- पूजा विधि

    हिंदू धर्म में वर्ष भर आने वाली प्रत्येक तिथि और व्रत का अपना विशिष्ट आध्यात्मिक महत्व होता है. इन ही पावन तिथियों में से एक है एकादशी, जिसका स्थान अत्यंत विशेष माना गया है. साल भर में कुल 24 एकादशी पड़ती हैं. प्रत्येक माह में दो बार, एक शुक्ल पक्ष में और एक कृष्ण पक्ष में. धार्मिक मान्यता के अनुसार, एकादशी के दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की उपासना करने से मनुष्य के जीवन में सुख, शांति और समृद्धि बढ़ती है. कहा जाता है कि इस व्रत के प्रभाव से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और जीवन में सकारात्मकता का संचार होता है.

    इस बार जो एकादशी पड़ने वाली है, वह है मोक्षदा एकादशी, एक ऐसा पावन दिन, जिसका नाम ही अपने महत्व को स्पष्ट करता है. ‘मोक्षदा’ यानी मोक्ष प्रदान करने वाली एकादशी, शास्त्रों में वर्णन है कि इस दिन किया गया व्रत और पूजा न केवल साधक के लिए कल्याणकारी होता है, इस बार यह यह तिथि को लेकर असमंजस की स्थिति देखने को बन रही है. आइए उज्जैन के आचार्य आनंद भारद्वाज से जानते हैं सही तिथि और नियम.
    कब मनाई जाएगी मोक्षदा एकादशी?
    हिंदू पंचांग के अनुसार, इस बार मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी 30 नवंबर की रात 9 बजकर 29 मिनट से लेकर 1 दिसंबर 2025 की शाम 7 बजकर 01 मिनट बजे तक रहने वाली है. उदिया तिथि को ध्यान में रखते हुए मोक्षदा एकादशी का व्रत 1 दिसंबर को रखा जाएगा.

    भूलकर भी ना करें इस दिन यह काम
    एकादशी से पहले की रात सूर्यास्त के बाद भोजन न करें. रात में सोने से पहले भगवान का स्मरण या मंत्र का जाप जरूर अवश्य करें. व्रत के दौरान मन पूरी तरह शांत रखें और किसी के प्रति क्रोध या नकारात्मक भावना न आने दें. इस दिन भूलकर भी किसी की निंदा न करें. मोक्षदा एकादशी के दिन अनाज का सेवन वर्जित है. शाम की पूजा के बाद फलाहार किया जा सकता है. यदि व्रत न भी कर पाएं तो कम से कम चावल न खाएं. रात्रि में जागरण कर भजन-कीर्तन करना शुभ माना जाता है. अगले दिन सुबह व्रत का पारण करें और ब्राह्मणों को भोजन कराकर ही स्वयं भोजन ग्रहण करें.

    जरूर करें इन मंत्रों का जाप
    1. ॐ वासुदेवाय विघ्माहे वैधयाराजाया धीमहि तन्नो धन्वन्तरी प्रचोदयात् ||
    ॐ तत्पुरुषाय विद्‍महे अमृता कलसा हस्थाया धीमहि तन्नो धन्वन्तरी प्रचोदयात् ||
    2. शान्ताकारम् भुजगशयनम् पद्मनाभम् सुरेशम्
    विश्वाधारम् गगनसदृशम् मेघवर्णम् शुभाङ्गम्।
    लक्ष्मीकान्तम् कमलनयनम् योगिभिर्ध्यानगम्यम्
    वन्दे विष्णुम् भवभयहरम् सर्वलोकैकनाथम्॥
    3. ॐ यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धनधान्याधिपतये
    धनधान्यसमृद्धिं मे देहि दापय स्वाहा॥

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