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    Nalanda की नई पहचान, नालंदा यूनिवर्सिटी में रामायण-महाभारत से सीख रहे विदेशी छात्र

    नालंदा (बिहार):अगर आज के दौर में होर्मुज जलडमरूमध्य (स्ट्रेट) जैसा गंभीर अंतरराष्ट्रीय संकट खड़ा हो जाए, तो भगवान राम भारत की विदेश नीति को किस दिशा में ले जाते? या फिर अमेरिका, रूस और चीन जैसी महाशक्तियों के साथ जटिल कूटनीतिक रिश्तों को साधने के लिए भगवान कृष्ण की क्या सलाह होती? वर्तमान में बिहार के ऐतिहासिक नालंदा विश्वविद्यालय में वैश्विक राजनीति से जुड़े इन्हीं गूढ़ सवालों के जवाब तलाशे जा रहे हैं। 30 से अधिक देशों के छात्रों वाले इस अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय ने अपने विशेष पोस्टग्रेजुएट कोर्स 'इंटरनेशनल रिलेशन्स एंड पीस स्टडीज' (IRPS) के तहत भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक कूटनीति से जोड़ने की एक अनूठी पहल की है।

    प्राचीन ग्रंथों के जरिए वैश्विक चिंताओं का समाधान

    नालंदा विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर सचिन चतुर्वेदी के अनुसार, इस विशेष कोर्स का मुख्य उद्देश्य प्राचीन भारतीय ज्ञान प्रणालियों और परंपराओं को पुनर्जीवित करना है। हाल के दिनों में विश्वविद्यालय ने कई ऐसे बहु-विषयक (interdisciplinary) अकादमिक शोध शुरू किए हैं, जो आज की वैश्विक चिंताओं और रणनीतिक अध्ययनों को रामायण, महाभारत और अर्थशास्त्र जैसे महान ग्रंथों से जोड़ते हैं। छात्र अपने शोध-पत्रों (dissertations) में यह समझने का प्रयास कर रहे हैं कि पर्यावरण, सामाजिक और शासन (ESG) के आधुनिक सिद्धांतों को प्राचीन शासन-प्रशासन के अनुभवों से कैसे बेहतर बनाया जा सकता है।

    राम-सुग्रीव गठबंधन से समझी जा रही है आधुनिक रणनीतिक साझेदारी

    विश्वविद्यालय की मास्टर डिग्री की छात्रा सुरभि रानी ने अपने शोध-पत्र में रामायण के 'किष्किंधा कांड' को आधुनिक कूटनीतिक गठबंधनों को समझने का एक बेहतरीन जरिया बताया है। उनके शोध के अनुसार, श्रीराम और सुग्रीव के बीच का गठबंधन केवल एक पौराणिक मित्रता नहीं, बल्कि राजधर्म, आपसी विश्वास और धार्मिक यथार्थवाद पर आधारित 'समान और संप्रभु साझेदारी' का एक बेहतरीन मॉडल है। यह मॉडल दिखाता है कि बिना किसी प्रभुत्व या कब्जे के भी एक शक्तिशाली और जिम्मेदार नेतृत्व कैसे तैयार किया जा सकता है। छात्र इस प्राचीन दर्शन की तुलना पश्चिमी विद्वानों के सिद्धांतों के साथ-साथ वर्तमान भारतीय विदेश नीति के 'विश्व बंधु' दृष्टिकोण से भी कर रहे हैं।

    भगवान कृष्ण की रणनीतिक सूझबूझ और 'सॉफ्ट पावर' पर शोध

    एक अन्य शोधकर्ता प्रीति कुमारी ने महाभारत के संदर्भ में भगवान कृष्ण द्वारा इस्तेमाल की गई 'सॉफ्ट पावर' (नरम शक्ति) और 'नियम-आधारित व्यवस्था' पर प्रकाश डाला है। उनका शोध बताता है कि महाभारत में कृष्ण का दर्शन आधुनिक अंतरराष्ट्रीय संबंधों के 'न्यायपूर्ण युद्ध' (Just War) और 'परम आपातकाल' (Supreme Emergency) के सिद्धांतों से मेल खाता है। जिस तरह कृष्ण ने अतीत में नियमों का उल्लंघन करने वाले कर्ण को युद्ध के नियमों के तहत मिलने वाली सुरक्षा से वंचित कर दिया था, ठीक उसी तरह आज की अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था भी उन आतंकवादी नेटवर्कों या दुष्ट देशों का सामना कर रही है जो अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन तो करते हैं, लेकिन खुद पर कार्रवाई के वक्त उन्हीं कानूनों को ढाल बना लेते हैं।

    अगले साल से 'शास्त्रार्थ' के जरिए वैश्विक व्यवस्था को नई दिशा

    पश्चिमी देशों की वाद-विवाद पद्धतियों से इतर, भारतीय ज्ञान परंपरा हमेशा से ज्ञान के संचय और आपसी समझ पर आधारित रही है। कुलपति सचिन चतुर्वेदी ने बताया कि नालंदा विश्वविद्यालय अगले शैक्षणिक सत्र से अपने पाठ्यक्रम में 'शास्त्रार्थ' (पारंपरिक बहस) जैसी पहलों को और अधिक व्यवस्थित रूप से शामिल करने जा रहा है। विश्वविद्यालय का मानना है कि रामायण, महाभारत और प्राचीन दर्शन के माध्यम से दुनिया को वैश्विक संघर्षों, शांति स्थापना और नई वैश्विक व्यवस्था को समझने के लिए एक मजबूत और समृद्ध 'भारतीय ज्ञान परंपरा' का विकल्प दिया जा सकता है।

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