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    नैनो उर्वरकों से बदल रही खेती की तस्वीर : कम लागत में अधिक उत्पादन की नई राह

    रायपुर : खेती-किसानी में बढ़ती लागत और मिट्टी की घटती उर्वरता के बीच नैनो यूरिया और नैनो डीएपी किसानों के लिए नई उम्मीद बनकर उभरे हैं। आधुनिक नैनो तकनीक पर आधारित ये उर्वरक कम मात्रा में अधिक प्रभाव देने के कारण किसानों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि इनके संतुलित उपयोग से उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ खेती को अधिक टिकाऊ और पर्यावरण अनुकूल बनाया जा सकता है।

    नैनो उर्वरकों की सबसे बड़ी विशेषता उनकी उच्च उपयोग दक्षता है। जहां पारंपरिक यूरिया और डीएपी का केवल 30 से 50 प्रतिशत भाग ही फसल द्वारा उपयोग हो पाता है, वहीं नैनो उर्वरकों की दक्षता 80 प्रतिशत से अधिक बताई जाती है। इससे पौधों को आवश्यक पोषक तत्व सीधे और प्रभावी रूप से प्राप्त होते हैं तथा उर्वरक की बर्बादी कम होती है।

    धान की फसल में नैनो डीएपी का पहला छिड़काव रोपाई के 25 से 30 दिन बाद तथा दूसरा छिड़काव 10 से 15 दिन बाद किया जा सकता है। वहीं नैनो यूरिया का पहला छिड़काव रोपाई के 30 से 35 दिन बाद और दूसरा छिड़काव बालियां निकलने से पहले किया जाना लाभकारी है। प्रति एकड़ 250 मिलीलीटर नैनो उर्वरक को लगभग 125 लीटर पानी में घोलकर पत्तियों पर समान रूप से छिड़काव किया जाता है।

    लागत के लिहाज से भी नैनो उर्वरक किसानों के लिए आकर्षक विकल्प हैं। 500 मिलीलीटर नैनो यूरिया की एक बोतल लगभग 45 किलोग्राम पारंपरिक यूरिया का प्रभाव लगभग बराबर है। इससे परिवहन, भंडारण और श्रम लागत में भी कमी आती है। साथ ही मिट्टी और जल प्रदूषण कम होने से पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा मिलता है।

    कृषि विभाग द्वारा गांव-गांव में प्रशिक्षण, प्रदर्शन और जागरूकता कार्यक्रम आयोजित कर किसानों को नैनो उर्वरकों के वैज्ञानिक उपयोग की जानकारी दी जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि संतुलित पोषण प्रबंधन के साथ नैनो तकनीक का उपयोग भविष्य की कृषि को अधिक लाभकारी, टिकाऊ और प्रतिस्पर्धी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
     

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