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    बिजली बिल का नया झटका, फ्यूल सरचार्ज में रिकॉर्ड बढ़ोतरी पर उठे सवाल

    जबलपुर: मध्य प्रदेश में ऊर्जा मंत्री को बिना अंधेरे में रखे बिजली के फ्यूल सरचार्ज में की गई बेतहाशा बढ़ोतरी का चौतरफा विरोध शुरू हो गया है। नागरिक उपभोक्ता मार्गदर्शक मंच के बैनर तले विभिन्न जन संगठनों ने इस गुप्त वृद्धि पर कड़ा ऐतराज जताया है। इस सिलसिले में डॉ. पीजी नाजपांडे, रजत भार्गव, टीके रायघटक, संतोष श्रीवास्तव, एडवोकेट वेदप्रकाश अधौलिया और एडवोकेट जीएस सोनकर सहित कई पदाधिकारियों ने जिला प्रशासन के जरिए राज्य सरकार और विद्युत नियामक आयोग को एक ज्ञापन सौंपा है। इस पत्र में मांग की गई है कि पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश की तरह मध्य प्रदेश में भी इस मनमाने सरचार्ज पर तुरंत रोक लगाई जाए और उपभोक्ताओं के अधिकारों की रक्षा के लिए एक उच्च स्तरीय जांच समिति बनाई जाए।

    पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश के कड़े फैसले की नजीर

    उपभोक्ता संगठनों ने उत्तर प्रदेश सरकार के हालिया कदम का उदाहरण देते हुए बताया कि वहां के ऊर्जा मंत्री ने फ्यूल सरचार्ज की मनमानी वसूली पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है। इसके साथ ही उन्होंने बिजली विभाग के आला अधिकारियों के खिलाफ जांच बैठाकर यह जवाब तलब किया है कि सरकार को सूचित किए बिना इतनी बड़ी बढ़ोतरी कैसे लागू कर दी गई। अब मध्य प्रदेश में भी इसी तरह की सख्त जवाबदेही तय करने की मांग उठ रही है ताकि आम जनता को इस अवांछित आर्थिक झटके से बचाया जा सके।

    चुपके से बढ़ाए गए आंकड़े; मार्च में जो शून्य था, वो जून में चरम पर

    उपभोक्ता मंच ने बिजली कंपनियों की इस मनमानी के आंकड़े सार्वजनिक करते हुए बताया कि:

    • राज्य में मार्च के महीने तक फ्यूल सरचार्ज 0 प्रतिशत पर था।

    • बिजली कंपनियों ने चालाकी से इसे अप्रैल में बढ़ाकर सीधे 5.36 प्रतिशत कर दिया।

    • इसके बाद मई और जून के महीनों में इसे 3.91 प्रतिशत पर बनाए रखा गया।

    सबसे ज्यादा आपत्ति इस बात पर है कि बिजली विभाग के अधिकारियों ने इस भारी वित्तीय बोझ को आम जनता पर थपने से पहले मध्य प्रदेश सरकार या कैबिनेट से कोई प्रशासनिक मंजूरी लेना जरूरी नहीं समझा, जो सीधे तौर पर नियमों का उल्लंघन है।

    विद्युत अधिनियम की धारा 108 के तहत हस्तक्षेप की मांग

    मंच के कानूनी विशेषज्ञों और पदाधिकारियों का कहना है कि विद्युत नियामक आयोग के नियमों में फ्यूल सरचार्ज को ऑटोमैटिक तरीके से बढ़ाने का प्रावधान (प्रथम संशोधन) जरूर है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि सरकार मूकदर्शक बनी रहे। राज्य सरकार के पास कानूनन असीमित अधिकार हैं। जन संगठनों ने मांग की है कि मुख्यमंत्री और ऊर्जा मंत्री को उपभोक्ताओं के व्यापक हित में बिजली कानून की धारा 108 का तत्काल प्रयोग करना चाहिए और बिजली कंपनियों की इस तानाशाही पर लगाम लगानी चाहिए।

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