उज्जैन: अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के शीर्ष नेतृत्व को लेकर संतों के बीच लंबे समय से जारी खींचतान में अब एक बेहद दिलचस्प और बड़ा उलटफेर देखने को मिला है। चार महीने पहले तक विरोधी खेमे में खड़ा रहने वाला निर्मोही अणि अखाड़ा अब पूरी तरह से पलट गया है और उसने दूसरे गुट को अपना समर्थन दे दिया है। पवित्र नगरी में संतों के बीच हुई इस गुप्त और अहम बैठक के बाद लिए गए फैसले ने आगामी नासिक कुंभ और साल 2028 में होने वाले उज्जैन सिंहस्थ से ठीक पहले संत समाज के भीतर की पूरी सियासी तस्वीर और समीकरणों को पूरी तरह से बदल कर रख दिया है।
उज्जैन की बैठक में संतों ने लिया बड़ा यू-टर्न
धार्मिक नगरी में मंगलवार की रात को निर्मोही अणि अखाड़े के प्रमुख संतों की एक बेहद महत्वपूर्ण और आपात बैठक का आयोजन किया गया था। इस हाई-प्रोफाइल बैठक की कमान खुद महंत रविंद्र पुरी ने संभाली, जिसमें श्रीमहंत मदन मोहन दास, श्रीमहंत भगवान दास और श्रीमहंत सीताराम दास सहित अखाड़े के कई वरिष्ठ पंच और पदाधिकारी विशेष रूप से मौजूद रहे। बैठक में काफी देर तक चले मंथन के बाद अखाड़े ने आधिकारिक तौर पर यह बड़ा ऐलान कर दिया कि वे भविष्य में होने वाले सभी कुंभ मेलों और धार्मिक आयोजनों में महंत रविंद्र पुरी के नेतृत्व वाली अखाड़ा परिषद के झंडे तले ही काम करेंगे और उनके हर फैसले का पुरजोर समर्थन करेंगे।
दो फाड़ में बंटी अखाड़ा परिषद का पूरा गणित
सनातन धर्म की सर्वोच्च संस्था मानी जाने वाली अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद पिछले काफी समय से दो शक्तिशाली गुटों में बंटी हुई नजर आ रही है। इस विवाद में एक धड़ा निरंजनी अखाड़े के सचिव महंत रविंद्र पुरी को अपना असली अगुआ और अध्यक्ष स्वीकार करता है, जबकि दूसरा विरोधी धड़ा महानिर्वाणी अखाड़े के सचिव रविंद्र पुरी के नाम पर अपनी सहमति जताता है। दोनों ही गुट लंबे समय से देश के अधिकांश अखाड़ों को अपने पाले में होने का दम भरते रहे हैं, लेकिन ताजा घटनाक्रम के बाद महंत रविंद्र पुरी ने दावा ठोंका है कि अब जूना, आह्वान, अग्नि, निरंजनी, आनंद, पंच निर्मोही, निर्मल और बड़ा उदासीन जैसे बड़े और प्रभावशाली अखाड़े पूरी ताकत के साथ उनके नेतृत्व के साथ खड़े हैं।
महज चार महीने के भीतर बदल गए संतों के सुर
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे ज्यादा हैरान करने वाली बात यह है कि इसी साल बाईस मार्च को निर्मोही अणि अखाड़े सहित कुछ अन्य अखाड़ों ने एक सुर में महानिर्वाणी अखाड़े के सचिव रविंद्र पुरी के प्रति अपनी निष्ठा जताई थी और उनके नेतृत्व को सर्वोपरि माना था। महज चार महीने के भीतर ही उसी अखाड़े का अपना स्टैंड बदलकर अचानक निरंजनी अखाड़े वाले गुट के पाले में चले जाना संतों की आंतरिक राजनीति में आ रहे एक बहुत बड़े भूचाल और नए गठजोड़ की तरफ साफ इशारा कर रहा है।
पांच सालों से लगातार जारी है वर्चस्व की यह जंग
अखाड़ा परिषद के भीतर नेतृत्व और कुर्सी को लेकर वर्चस्व की यह कड़वी लड़ाई साल 2021 के हरिद्वार कुंभ के बाद से लगातार सुलग रही है, जब तत्कालीन अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरि के असमय ब्रह्मलीन होने के बाद नए अध्यक्ष के नाम पर संतों में आम सहमति नहीं बन पाई थी। इसके बाद से ही परिषद दो अलग-अलग धड़ों में बंट गई और दोनों ही खुद को असली परिषद बताते रहे हैं। धार्मिक मामलों के जानकारों का कहना है कि किसी भी बड़े कुंभ मेले से ठीक पहले अध्यक्ष पद की यह लड़ाई इसलिए इतनी उग्र हो जाती है क्योंकि यही वह गौरवशाली पद है जो पूरे देश के संत समाज का प्रतिनिधित्व करता है और इसी रुतबे को हासिल करने के लिए हर कुंभ से पहले संतों के बीच यह गुटबाजी खुलकर सड़कों पर आ जाती है।


