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    ‘किसी का भविष्य सुरक्षित नहीं’—महाधिवक्ता प्रकरण पर BJP का हेमंत सरकार पर निशाना

    रांची। झारखंड में राजनीतिक और प्रशासनिक हलचल के बीच राज्य के महाधिवक्ता (एडवोकेट जनरल) राजीव रंजन के इस्तीफे की खबरों ने तूल पकड़ लिया है। इस घटनाक्रम को लेकर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) नीत सरकार पर तीखा हमला बोला है और राज्य में संवैधानिक पदों की गरिमा के साथ 'म्यूजिकल चेयर' का खेल खेलने का आरोप लगाया है। भाजपा का कहना है कि इस सरकार में किसी भी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति का भविष्य सुरक्षित नहीं है। सूत्रों के मुताबिक, राजीव रंजन ने अपना इस्तीफा मुख्य सचिव को सौंप दिया था, हालांकि इस पर महाधिवक्ता या सरकार की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि या बयान नहीं आया है। राजीव रंजन साल 2020 से, यानी मौजूदा गठबंधन सरकार के गठन के समय से ही इस पद पर बने हुए थे।

    विपक्ष ने सरकार को घेरा और श्वेत पत्र की मांग की

    इस पूरे मामले पर विपक्ष ने सरकार की मंशा पर सवाल उठाए हैं। भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता ने कहा कि सरकार चाहे इस इस्तीफे को स्वेच्छा से लिया गया फैसला बताए या दबाव का परिणाम, राज्य की जनता असलियत को अच्छी तरह समझ रही है। उन्होंने सरकार से महाधिवक्ता के पूरे कार्यकाल पर एक श्वेत पत्र जारी करने की मांग की है। विपक्ष का तर्क है कि अगर उनका कार्यकाल बेहतर था तो उन्हें हटाने की नौबत क्यों आई, और अगर उनका काम संतोषजनक नहीं था तो उन्हें इतने लंबे समय तक इस महत्वपूर्ण पद पर क्यों बनाए रखा गया।

    रोहितश्य रॉय की नए महाधिवक्ता के रूप में नियुक्ति

    राजीव रंजन के इस्तीफे के बाद राज्य सरकार ने वरिष्ठ अधिवक्ता रोहितश्य रॉय को झारखंड का नया महाधिवक्ता नियुक्त किया है, जिसकी अधिसूचना देर शाम जारी कर दी गई। विधि विभाग द्वारा जारी आदेश के अनुसार, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 165(1) के तहत राज्यपाल ने पूर्व महाधिवक्ता का इस्तीफा तत्काल प्रभाव से स्वीकार कर लिया है। नए महाधिवक्ता रोहितश्य रॉय झारखंड उच्च न्यायालय के बेहद अनुभवी और प्रतिष्ठित वकीलों में शुमार हैं। वे लंबे समय से संवैधानिक, दीवानी, सेवा संबंधी मामलों के साथ-साथ रिट याचिकाओं और सिविल विवादों में सरकार व अन्य पक्षों की पैरवी करते रहे हैं।

    क्या होती है महाधिवक्ता की भूमिका

    महाधिवक्ता का पद राज्य सरकार के भीतर सर्वोच्च कानूनी सलाहकार का होता है। उनका मुख्य कार्य उच्च न्यायालय और अन्य कानूनी मंचों पर राज्य सरकार का पक्ष मजबूती से रखना है। इसके अलावा, राज्य की नीतियों को तैयार करने, विधायी प्रक्रियाओं को सुचारू रूप से चलाने और जटिल संवैधानिक व कानूनी मामलों में सरकार को उचित परामर्श देने में उनकी भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है। प्रशासनिक और कानूनी नजरिए से इस बड़े बदलाव को राज्य के लिए बेहद अहम माना जा रहा है।

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