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    केवल चूना और रेत के मिश्रण से नहीं बनती थी पुरानी इमारतें: इतिहासकार

    नई दिल्ली । मुगल काल की ताजमहल, लाल किला, हुमायूं का मकबरा और फतेहपुर सीकरी जैसी इमारतें सैकड़ों साल बाद भी पूरी मजबूती से खड़ी हैं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर बिना सीमेंट के ये इमारतें कैसे बनीं और क्या आज भी उसी तकनीक से निर्माण किया जा सकता है?
    मुगल काल में निर्माण कार्य के लिए आधुनिक सीमेंट की जगह चूने के गारे का उपयोग किया जाता था। यह केवल चूना और रेत का साधारण मिश्रण नहीं था, बल्कि इसमें कई प्राकृतिक चीजें मिलाई जाती थीं, जिससे इसकी मजबूती कई गुना बढ़ जाती थी। इस गारे को तैयार करने के लिए चूना और रेत के साथ गुड़, उड़द की दाल, बेलगिरी का पानी, दही, गोंद और बताशे जैसी प्राकृतिक सामग्रियां शामिल की जाती थीं। इन सभी चीजों को अच्छी तरह मिलाकर एक ऐसा मजबूत मिश्रण तैयार किया जाता था, जो पत्थरों को अदभुत मजबूती से जोड़कर रखता था। आधुनिक सीमेंट एक बार सूखने के बाद लगभग अपनी पूरी मजबूती हासिल कर लेता है, लेकिन चूने के गारे की खासियत कुछ अलग है। चूने का गारा धीरे-धीरे हवा में मौजूद कार्बन डाइऑक्साइड को अपने अंदर सोखता है और फिर दोबारा कैल्शियम कार्बोनेट में बदल जाता है। इस प्रक्रिया के कारण यह समय बीतने के साथ और ज्यादा मजबूत होता जाता है। यही वजह है कि मुगलों के समय बनी कई इमारतें आज भी मजबूती से खड़ी हैं। मुगल काल के कारीगर सिर्फ गारे पर ही निर्भर नहीं रहते थे, वे इसमें जूट और भांग जैसे प्राकृतिक रेशे भी मिलाते थे। ये रेशे दीवारों और प्लास्टर को अतिरिक्त मजबूती देते थे और दरारें पड़ने की संभावना को कम करते थे। सरल शब्दों में कहें तो, ये उसी तरह काम करते थे जैसे आज आधुनिक कंक्रीट में स्टील की सरिया इस्तेमाल की जाती है। इसी तकनीक ने इमारतों को लंबे समय तक मौसम की मार झेलने लायक बनाया। ताजमहल की मजबूती का एक बड़ा कारण उसकी नींव भी मानी जाती है।
     इतिहासकारों के अनुसार, इसकी नींव में आबनूस जैसी मजबूत लकड़ी और विशेष लकड़ी की संरचनाओं का उपयोग किया गया था। यमुना नदी के पास होने के कारण, वहाँ की नमी ने इन लकड़ियों को सूखने या सड़ने नहीं दिया। लगातार नमी मिलने से उनकी मजबूती बनी रही और नींव सालों तक सुरक्षित रही। यही कारण है कि ताजमहल आज भी अटल खड़ा है। विशेषज्ञों के अनुसार, चूने पर आधारित निर्माण तकनीक का इस्तेमाल आज भी किया जा सकता है। इसे पर्यावरण के लिए बेहतर माना जाता है क्योंकि इसमें कार्बन उत्सर्जन अपेक्षाकृत कम होता है। चूने से बनी दीवारें हवा का बेहतर आदान-प्रदान करती हैं, जिससे घर के अंदर नमी नियंत्रित रहती है और गर्मियों में घर अपेक्षाकृत ठंडा तथा सर्दियों में गर्म महसूस होता है। यही कारण है कि पुराने समय के कई मकानों में बिना एयर कंडीशनर के भी तापमान काफी संतुलित रहता था। इतने फायदे होने के बावजूद, आज अधिकांश निर्माण कार्यों में चूने के गारे का इस्तेमाल नहीं किया जाता। सबसे बड़ी वजह समय है।
    आधुनिक सीमेंट कुछ घंटों या दिनों में मजबूत हो जाता है, जबकि चूने के गारे को पूरी तरह मजबूत होने में कई-कई महीने लग जाते हैं। आज की तेज रफ्तार निर्माण प्रक्रिया में इतना इंतजार करना मुश्किल माना जाता है। इसके अलावा, इस तकनीक में अच्छे और योग्य कारीगरों की आवश्यकता होती है, और उच्च गुणवत्ता वाला चूना, प्राकृतिक सामग्री तथा पारंपरिक तरीके से निर्माण करने में खर्च भी अधिक आता है। यही कारण है कि आज बड़े पैमाने पर होने वाले निर्माण कार्यों में सीमेंट को प्राथमिकता दी जाती है। मालूम हो कि भारत में लगभग 300 सालों तक चले मुगल शासन ने कई ऐसी शानदार इमारतें बनवाईं, जो आज भी उनकी भव्यता और उत्कृष्ट इंजीनियरिंग का प्रतीक हैं। सबसे हैरानी की बात यह है कि इन ऐतिहासिक इमारतों का निर्माण उस समय हुआ था जब आधुनिक सीमेंट का इस्तेमाल नहीं होता था।

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