More
    Homeराजनीतिसंसद स्थगित, लेकिन सत्रावसान नहीं! 11 दिन बाद भी आदेश का इंतजार...

    संसद स्थगित, लेकिन सत्रावसान नहीं! 11 दिन बाद भी आदेश का इंतजार क्यों?

    नई दिल्ली।  संसद का मानसून सत्र 13 अगस्त 2026 को दोनों सदनों के अनिश्चितकाल के लिए स्थगित होने के साथ समाप्ति की ओर बढ़ गया, लेकिन 24 अगस्त तक राष्ट्रपति की ओर से सत्रावसान का औपचारिक आदेश जारी नहीं हुआ है। सामान्य संसदीय परंपरा में सदन के अनिश्चितकाल के लिए स्थगित होने और सत्रावसान के बीच आम तौर पर दो से चार दिन का अंतर रहता है। ऐसे में इस बार 11 दिन का अंतर जरूर असामान्य है। हालांकि संसदीय इतिहास में इससे कहीं अधिक लंबे अंतराल के उदाहरण भी मिलते हैं।

    स्थगन और सत्रावसान एक नहीं

    संसदीय कार्यवाही में स्थगन और सत्रावसान दो अलग-अलग संवैधानिक प्रक्रियाएं हैं। जब लोकसभा या राज्यसभा को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित किया जाता है तो इसका अर्थ यह नहीं होता कि संसद का सत्र संवैधानिक रूप से समाप्त हो गया। सत्र का औपचारिक अंत राष्ट्रपति द्वारा सत्रावसान की घोषणा के बाद होता है। यानी 13 अगस्त को सदनों की बैठकें समाप्त हो गईं, लेकिन जब तक राष्ट्रपति की ओर से सत्रावसान की घोषणा नहीं होती, तब तक संवैधानिक दृष्टि से सत्र का औपचारिक समापन नहीं माना जाता।

    इस बार क्या हुआ?

    2026 का मानसून सत्र 20 जुलाई को शुरू हुआ और 13 अगस्त को दोनों सदनों को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया। इस दौरान संसद की 19 बैठकें हुईं। लेकिन 24 अगस्त तक सत्रावसान की औपचारिक अधिसूचना जारी नहीं हुई। यानी सदनों के अनिश्चितकाल के लिए स्थगित होने के 11 दिन बाद भी सत्र का औपचारिक समापन नहीं हुआ है। यही बात इस पूरे घटनाक्रम को महत्वपूर्ण बनाती है।

    सामान्यतः कितने दिन लगते हैं?

    संसद के आधिकारिक दस्तावेजों के अनुसार, लोकसभा के अनिश्चितकाल के लिए स्थगित होने और सत्रावसान के बीच सामान्यतः दो से चार दिन का अंतर रहता है। कई अवसरों पर दोनों प्रक्रियाएं एक ही दिन या अगले दिन पूरी हुई हैं। इस लिहाज से इस बार 11 दिन का अंतर सामान्य संसदीय परंपरा की तुलना में निश्चित रूप से लंबा है। लेकिन क्या यह अभूतपूर्व है? नहीं।

    इतिहास में 27 दिन तक हुआ इंतजार

    भारतीय संसदीय इतिहास में ऐसे कई उदाहरण हैं जब सदन के अनिश्चितकाल के लिए स्थगित होने और सत्रावसान के बीच काफी लंबा अंतर रहा।
    1975 में यह अंतर 27 दिन का था।
    1979 में 16 दिन,
    1984 में 15 दिन,
    1988 में 25 दिन,
    1989 में 20 दिन और
    1993 में 26 दिन का अंतर रहा।
    अर्थात 11 दिन का मौजूदा अंतर संसदीय इतिहास में सबसे लंबा नहीं है। बल्कि इससे लगभग ढाई गुना तक अधिक अंतर के उदाहरण मौजूद हैं।

    हाल के वर्षों में प्रक्रिया तेज रही

    हाल के वर्षों में तस्वीर कुछ अलग रही है। 2025 में अप्रैल के सत्र में 4 अप्रैल को सदन अनिश्चितकाल के लिए स्थगित हुआ और अगले ही दिन 5 अप्रैल को सत्रावसान कर दिया गया। इसी तरह अगस्त 2025 में 21 अगस्त के स्थगन के बाद 22 अगस्त को सत्रावसान हुआ। दिसंबर 2025 में 19 दिसंबर को सदन स्थगित होने के बाद 23 दिसंबर को सत्रावसान की प्रक्रिया पूरी हुई। इससे स्पष्ट है कि हाल के वर्षों में स्थगन और सत्रावसान के बीच लंबा अंतर सामान्य प्रवृत्ति नहीं रहा है।

    सत्रावसान का निर्णय कैसे होता है?

    संविधान के अनुच्छेद 85 के अनुसार राष्ट्रपति संसद के सदनों को आहूत करते हैं और सत्रावसान भी करते हैं। व्यवहार में इसके लिए सरकार की ओर से संसदीय कार्यवाही से जुड़ी आवश्यक प्रक्रिया पूरी की जाती है। मंत्रिमंडल स्तर पर निर्णय के बाद राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्ताव जाता है और राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद सत्रावसान की औपचारिक अधिसूचना जारी होती है। इसलिए सत्रावसान केवल संसद सचिवालय की सामान्य प्रशासनिक कार्रवाई नहीं है। इसमें संवैधानिक प्रक्रिया शामिल होती है।

    क्या 11 दिन की देरी असंवैधानिक है?

    इस प्रश्न का उत्तर सावधानी से देना होगा। केवल 11 दिन का अंतर अपने आप में असंवैधानिक नहीं कहा जा सकता। इतिहास में 15, 20, 25 और यहां तक कि 27 दिन के अंतर के उदाहरण मौजूद हैं। इसलिए केवल देरी के आधार पर इसे संविधान-विरोधी कहना उचित नहीं होगा। लेकिन दूसरी ओर यह भी तथ्य है कि सामान्य संसदीय परंपरा दो से चार दिन की रही है। हाल के वर्षों में कई बार अगले ही दिन सत्रावसान हुआ है। इसलिए इस बार की देरी को असामान्य जरूर कहा जा सकता है।

    क्या इसके पीछे कोई राजनीतिक कारण है?

    यही सबसे महत्वपूर्ण सवाल है। संसद के सदनों की बैठकें समाप्त हो चुकी हैं, लेकिन सत्रावसान की औपचारिक घोषणा अभी लंबित है। ऐसे में राजनीतिक हलकों में यह चर्चा स्वाभाविक है कि क्या सरकार किसी विशेष संसदीय परिस्थिति को ध्यान में रखकर सत्रावसान में समय ले रही है। विशेष सत्र की संभावना, किसी महत्वपूर्ण विधेयक को आगे बढ़ाने की तैयारी या अन्य संवैधानिक-संसदीय जरूरतें संभावित कारणों में हो सकती हैं। लेकिन जब तक सरकार की ओर से कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण नहीं आता, तब तक किसी एक राजनीतिक कारण को देरी की वजह मान लेना उचित नहीं होगा।

    एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक उदाहरण

    संसदीय इतिहास यह भी बताता है कि सदन के अनिश्चितकाल के लिए स्थगित होने के बाद उसी सत्र में दोबारा बैठक हो सकती है। 1990 में लोकसभा 7 सितंबर को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित हुई थी, लेकिन बाद में 1 से 5 अक्टूबर तक उसकी बैठक फिर हुई और अंततः 11 अक्टूबर को सत्रावसान हुआ। इससे स्पष्ट है कि अनिश्चितकाल के लिए स्थगन का अर्थ हर परिस्थिति में सत्र का अंतिम और अपरिवर्तनीय अंत नहीं होता।

    असली सवाल देरी का नहीं, कारण का है

    इस पूरे मामले को सनसनी के बजाय संवैधानिक और संसदीय दृष्टि से देखने की जरूरत है। इतिहास में 27 दिन तक सत्रावसान में देरी हो चुकी है। इसलिए 11 दिन को ऐतिहासिक रिकॉर्ड कहना गलत होगा। लेकिन सामान्य तौर पर दो से चार दिन में पूरी होने वाली प्रक्रिया का 11 दिन तक लंबित रहना सवाल जरूर खड़ा करता है। इसलिए असली सवाल यह नहीं है कि “11 दिन की देरी संविधान के खिलाफ है या नहीं?”

    असली सवाल है

    जब सामान्य संसदीय परंपरा दो से चार दिन की है, तो इस बार सत्रावसान का आदेश 11 दिन बाद भी क्यों लंबित है? और यदि इसके पीछे कोई विशेष संसदीय या प्रशासनिक कारण है, तो उसे सार्वजनिक करने में आखिर आपत्ति क्या है? संसद की बैठकें भले स्थगित हो गई हों, लेकिन सत्रावसान का आदेश अभी बाकी है—और इसके साथ उठे सवाल भी।

    latest articles

    explore more

    LEAVE A REPLY

    Please enter your comment!
    Please enter your name here