रोहतक: हरियाणा के सात नगर निकायों के हालिया चुनावी नतीजों ने प्रदेश की सियासी तस्वीर को एक बार फिर स्पष्ट कर दिया है, जहां भारतीय जनता पार्टी ने अपना दबदबा कायम रखते हुए विपक्षी खेमे को आत्ममंथन के लिए मजबूर कर दिया है।
भाजपा की चुनावी मशीनरी और रणनीतिक आक्रामकता
हरियाणा के निकाय चुनावों में भाजपा की जीत महज एक संयोग नहीं बल्कि उसकी सूक्ष्म प्रबंधन शैली और चुनावी गंभीरता का परिणाम नजर आती है। सांपला जैसी नगर पालिकाओं में, जिसे पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा का गढ़ माना जाता है, वहां भाजपा ने चुनाव के अंतिम दिनों में तीन कैबिनेट मंत्रियों सहित स्वयं मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी को प्रचार मैदान में उतारकर माहौल को पूरी तरह अपने पक्ष में कर लिया। पार्टी की यह कार्यशैली दर्शाती है कि वह किसी भी चुनाव को छोटा नहीं मानती और बूथ स्तर तक अपने कार्यकर्ताओं को सक्रिय रखकर विरोधियों के लिए घेराबंदी तैयार करने में माहिर हो चुकी है।
सत्ता पक्ष की नीतियों पर जनता का अटूट भरोसा
सात में से छह निकायों पर परचम लहराकर भाजपा ने यह सिद्ध कर दिया है कि प्रदेश की जनता मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी के नेतृत्व और सरकार की जनहितैषी नीतियों पर मुहर लगा रही है। लगातार तीन विधानसभा चुनावों में जीत के बाद नगर निकायों और राज्यसभा सीटों पर कब्जा जमाना यह संकेत देता है कि मतदाता फिलहाल किसी नए राजनीतिक प्रयोग के मूड में नहीं हैं। इन परिणामों से यह भी साफ होता है कि सरकार के कामकाज को लेकर आम जनमानस में एक सकारात्मक स्वीकार्यता बनी हुई है, जिसे भेद पाने में विपक्ष के तमाम दावे फिलहाल नाकाम साबित हो रहे हैं।
कांग्रेस की सांगठनिक कमजोरी और गुटबाजी का संकट
दूसरी ओर, इन नतीजों ने कांग्रेस की अंदरूनी कलह और सांगठनिक शिथिलता को एक बार फिर उजागर कर दिया है, जहां पार्टी चुनावी मैदान में पूरी ऊर्जा के साथ जुटने के बजाय बिखरी हुई नजर आई। विधानसभा चुनाव की हार के बाद उम्मीद की जा रही थी कि कांग्रेस एकजुट होकर वापसी करेगी, लेकिन सोनीपत और अंबाला जैसे अपने पारंपरिक प्रभाव वाले क्षेत्रों में भी पार्टी अपनी पकड़ बचाने में संघर्ष करती दिखी। उकलाना में एक निर्दलीय की जीत को कांग्रेस समर्थित बताकर साख बचाने की कोशिश जरूर की जा रही है, परंतु वास्तविकता यह है कि गुटबाजी के चलते पार्टी का ढांचा धरातल पर उतना सक्रिय नहीं हो पा रहा है जितनी जरूरत थी।
भविष्य की राजनीति और नेतृत्व के सामने चुनौतियां
मौजूदा चुनावी रुझान बताते हैं कि मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने अपनी सौम्य छवि और त्वरित फैसले लेने की क्षमता से जनता के बीच जो पैठ बनाई है, उसने भाजपा को एक 'अजेय इलेक्शन मशीन' के रूप में स्थापित कर दिया है। इन निरंतर चुनावी झटकों के बाद अब कांग्रेस के भीतर नेतृत्व और भविष्य की दिशा को लेकर नई बहस छिड़ना स्वाभाविक है क्योंकि पार्टी का पारंपरिक जनाधार धीरे-धीरे खिसकता जा रहा है। यदि विपक्ष ने अपनी रणनीति और आपसी समन्वय में समय रहते बड़े बदलाव नहीं किए, तो आगामी राजनीतिक सफर उसके लिए और अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है।


