चंडीगढ़: पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने एक अहम और राहत देने वाला फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि सरकारी कर्मचारियों के बुजुर्ग माता-पिता को सिर्फ इसलिए आश्रित मानने से मना नहीं किया जा सकता कि उन्हें मामूली वृद्धावस्था पेंशन मिल रही है। अदालत ने अपने ऐतिहासिक फैसले में रेखांकित किया कि बुजुर्ग माता-पिता की अपने बच्चों पर निर्भरता को केवल उनकी छोटी-मोटी आय या पेंशन के आधार पर नहीं आंका जा सकता। कोर्ट ने साफ तौर पर कहा कि चिकित्सा खर्च की प्रतिपूर्ति करना सरकार की कोई अनुकंपा या दया नहीं है, बल्कि यह सरकारी कर्मचारियों और उनके आश्रित परिजनों के स्वास्थ्य कल्याण के लिए बनाई गई एक आवश्यक व्यवस्था का अहम हिस्सा है।
हाईकोर्ट का कड़ा फैसला और हरियाणा सरकार का आदेश रद्द
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस संदीप मौदगिल ने हरियाणा रोडवेज के कर्मचारी बलवंत सिंह की ओर से दायर याचिका को स्वीकार कर लिया। इसके साथ ही कोर्ट ने राज्य सरकार के 14 अक्तूबर 2025 के उस विवादित आदेश को खारिज कर दिया, जिसके तहत याचिकाकर्ता की मां के इलाज का मेडिकल क्लेम निरस्त कर दिया गया था। अदालत ने हरियाणा सरकार को सख्त निर्देश दिए कि याचिकाकर्ता को 1,30,073 रुपये की मेडिकल प्रतिपूर्ति राशि 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ अगले दो महीनों के भीतर हर हाल में जारी की जाए। यदि सरकार तय सीमा में भुगतान करने में विफल रहती है, तो उसे 9 प्रतिशत की दर से ब्याज देना होगा।
जानिए क्या था पूरा मामला और क्यों खारिज हुआ था क्लेम
मामले के विवरण के अनुसार याचिकाकर्ता बलवंत सिंह की 85 वर्षीय बुजुर्ग मां चन्नो देवी का जुलाई 2024 में मोहाली स्थित मैक्स सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल में दिल का आपातकालीन ऑपरेशन हुआ था। इस दौरान डॉक्टरों ने स्टेंट डाला, जिस इलाज पर कुल 1,30,073 रुपये की राशि खर्च हुई थी। जब रोडवेज कर्मचारी ने नियमानुसार इस चिकित्सा खर्च की भरपाई के लिए विभाग के समक्ष क्लेम पेश किया, तो स्वास्थ्य विभाग ने 14 दिसंबर 2007 के पुराने प्रशासनिक दिशानिर्देशों का हवाला देते हुए याचिकाकर्ता की मां को पूर्ण आश्रित न मानकर उनके दावे को खारिज कर दिया था।
पूरी तरह आश्रित शब्द की हाईकोर्ट ने की नई व्याख्या
अदालत ने सुनवाई के दौरान 'पूरी तरह से आश्रित' शब्द को नए और मानवीय दृष्टिकोण से परिभाषित किया। पीठ ने कहा कि पूर्ण निर्भरता का दायरा केवल आर्थिक स्थिति तक सीमित नहीं होता, बल्कि इसमें बढ़ती उम्र से जुड़ी शारीरिक और चिकित्सीय निर्भरता भी समान रूप से शामिल है। अदालत ने तर्क दिया कि बुजुर्ग और गंभीर बीमारियों से जूझ रहे माता-पिता को मिलने वाली मामूली वृद्धावस्था पेंशन उन्हें निजी या सुपर स्पेशियलिटी अस्पतालों में महंगे इलाज का खर्च उठाने के योग्य नहीं बनाती। ऐसे में पेंशन को आधार बनाकर इलाज के खर्च का दावा खारिज करना पूरी तरह से मनमाना और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है।
सरकारी कर्मचारियों और पेंशनभोगी परिवारों को बड़ी राहत
हाईकोर्ट के इस दूरगामी फैसले से राज्य के हजारों सरकारी कर्मचारियों और उनके बुजुर्ग आश्रितों को बड़ी राहत मिली है। अदालत के इस रुख ने यह सुनिश्चित कर दिया है कि भविष्य में प्रशासनिक नियमों का हवाला देकर कोई भी विभाग कर्मचारियों के वैध मेडिकल दावों को अकारण खारिज नहीं कर पाएगा। कोर्ट के निर्णय से स्पष्ट हो गया है कि वृद्धावस्था पेंशन पाने वाले माता-पिता भी अपने कामकाजी बच्चों के मेडिकल बेनिफिट्स और स्वास्थ्य प्रतिपूर्ति के पूरे हकदार हैं।


