शिरडी: जब भी साईं बाबा का नाम लिया जाता है, तो महाराष्ट्र का प्रसिद्ध और छोटा सा गांव शिरडी आंखों के सामने आ जाता है। यह पावन भूमि बाबा के जीवन, उनकी उपस्थिति और उनकी सार्वभौमिक शिक्षाओं से गहराई से जुड़ी हुई है। बाबा ने अपने जीवन का अधिकांश महत्वपूर्ण समय यहीं बिताया और दुनिया भर से आने वाले श्रद्धालुओं को प्रेम, सब्र, सच्ची सेवा और इंसानियत का मार्ग दिखाया। उनके जीवन से जुड़ी कई ऐसी प्रेरणादायक बातें और परंपराएं हैं, जिन्हें भक्त आज भी पूरी श्रद्धा के साथ याद करते हैं, और इनमें से सबसे खास प्रसंग उनका घर-घर जाकर भिक्षा मांगना था।
शिरडी की चुनिंदा गलियों तक सीमित थी बाबा की भिक्षा यात्रा
श्री साईं बाबा संस्थान ट्रस्ट के ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, साईं बाबा कभी भी भिक्षा के लिए दूसरे गांवों में नहीं जाते थे, बल्कि वे केवल शिरडी की कुछ विशेष गलियों और चुनिंदा घरों के द्वार पर ही जाया करते थे। बाबा जिन परिवारों के घर भिक्षा मांगने जाते थे, उनमें वामन गोंडकर, वामन सखाराम शेल्के, बैजाबाई, गणपत कोटे पाटिल, बायाजी आप्पा कोटे पाटिल और नंदराम मारवाड़ी के घर मुख्य रूप से शामिल थे। उनके लिए भिक्षा मांगना कोई दिखावा नहीं था, बल्कि वे बेहद साधारण मुद्रा में दरवाजे पर खड़े होकर भिक्षा स्वीकार करते थे, जहां उन्हें किसी घर से रोटी तो किसी से सब्जी या अन्य खाद्य सामग्री प्राप्त होती थी।
भिक्षा के अन्न को जरूरतमंदों और जीवों में बांटने की अनूठी परंपरा
साईं बाबा की इस दिनचर्या से जुड़ी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे भिक्षा में मिलने वाले भोजन को कभी भी अपने लिए संचित करके नहीं रखते थे। द्वारकामाई लौटने के बाद वे उस सारे भोजन को एक बड़े बर्तन में मिला देते थे, ताकि वहां आने वाले जरूरतमंद लोग और बेसहारा जीव-जंतु भी उससे भोजन प्राप्त कर सकें। बाबा खुद उस साझा किए गए भोजन में से बेहद थोड़ा सा हिस्सा ग्रहण करते थे। उनके लिए अन्न केवल पेट भरने का जरिया नहीं था, बल्कि यह जरूरतमंदों की सेवा और आपस में सब कुछ बांटकर खाने की पवित्र भावना का प्रतीक था, जो समानता का संदेश देता था।
भक्त बैजाबाई की गहरी श्रद्धा और भिक्षा का गूढ़ अर्थ
साईं बाबा की इस दिनचर्या में माता बैजाबाई का प्रसंग अत्यंत भावुक और प्रसिद्ध है। बैजाबाई की बाबा के प्रति अटूट श्रद्धा थी, और जब बाबा जंगल में एकांतवास में रहते थे, तब वह खुद जंगल में उन्हें तलाशते हुए भोजन लेकर पहुंच जाती थीं। बाद में जब बाबा नियमित रूप से घरों से भिक्षा लेने लगे, तो वे उनके घर भी विशेष रूप से जाते थे। बैजाबाई बाबा को भोजन कराने को अपना परम सौभाग्य मानती थीं। जानकारों के अनुसार, बाबा का भिक्षा मांगना केवल पेट भरने का माध्यम नहीं था, बल्कि इसके जरिए वे इंसानी अहंकार को मिटाने और समाज में सेवा तथा समरसता की एक ऐसी मिसाल कायम कर रहे थे, जो आज भी शिरडी की द्वारकामाई में जीवंत रूप से महसूस की जाती है।


