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    गोली आंख चीर गई, फिर भी नहीं झुकी हिम्मत; पढ़ें जांबाजी की सच्ची कहानी

    कारगिल युद्ध में दुश्मन केरन सेक्टर में बने भारतीय सेना के बेस कैंप को उड़ाना चाहते थे, क्योंकि उन्हें मालूम था कि यहीं सेना के रसद, हथियार, दवाएं व एविएशन ऑयल (विमानन तेल) के भंडार हैं। सेना का हेलिपैड भी इसी सेक्टर में माैजूद था। दुश्मन की सोच थी कि यदि इस बेस कैंप को तबाह कर दिया जाए तो कारगिल युद्ध में सेना की बड़ी सप्लाई चेन को रोक दिया जाएगा मगर भारतीय जवानों ने अपने पराक्रम से दुश्मन के इस नापाक मंसूबे को पूरा नहीं होने दिया।

    युद्ध में वीरता दिखाने वाले राष्ट्रपति से सेना मेडल प्राप्त फरीदकोट निवासी 22 सिख रेजिमेंट के हवलदार नछतर सिंह ने इस घटना को साझा करते हुए बताया कि सेना को सूचना मिली थी कि कुछ घुसपैठिये बेस कैंप को उड़ाने के इरादे से पहुंच चुके हैं। सूबेदार मोहन सिंह के साथ उन्होंने मोर्चा संभाला और घुसपैठियों से लोहा लेने निकल पड़े। फौज ने रणनीतिक ढंग से घुसपैठियों की घेराबंदी कर ली थी। उसके बाद राकेट लांचर से एयर ब्रस्ट किया गया। इस दौरान तीन घुसपैठिये घायल हो गए जबकि दो ने अपनी लोकेशन बदल ली।

    नछत्तर बताते हैं कि काफी देर तक जब दुश्मन खेमे में कोई हलचल नहीं हुई तो उन्होंने आगे बढ़कर देखा, तभी छिपे हुए घुसपैठियों ने उनकी ओर ग्रेनेड फेंक दिया। उन्होंने फुर्ती दिखाकर फटने से पहले दुश्मन के ग्रेनेड को उठाकर उन्हीं की ओर वापस फेंक दिया। इस हमले में तीन और घुसपैठिये घायल हो गए, तभी उन्होंने अपनी एके-47 से तीनों को छलनी कर उन्हें मार दिया। अभी वे संभले ही थे कि वहां छिपे अन्य घुसपैठियों ने उनपर राइफल ग्रेनेड फायर कर दिया। इसके छर्रों से वे जख्मी हो गए। उसके बाद तो उन्होंने और उनके साथियों ने ठान लिया था कि अब मरेंगे या मारेंगे। इसी सोच के साथ उन्होंने दुश्मनों पर जबरदस्त फायर खोलते हुए उन्हें माैत की नींद सुला दिया।

    स्ट्रैचर नहीं था, लकड़ी पर लिटाकर पगड़ी से बांध नीचे लाए थे साथी

    बेंस कैंप को बचाने के लिए दुश्मनों से आमने-सामने की इस लड़ाई में कोई भारतीय जवान शहीद नहीं हुआ केवल हवलदार नछत्तर सिंह ही घायल हुए थे। वे खून से लथपथ जख्मी पड़े थे और वहां स्ट्रैचर की भी व्यवस्था नहीं हो पा रही थी। ऐसे में उनके साथियों ने पेड़ की लकड़ी के एक टुकड़े पर उन्हें लिटाया और उनकी ही पगड़ी से उन्हें बांधकर नीचे ले आए। वहां से उन्हें पहले श्रीनगर और फिर चंडीमंदिर कमांड अस्पताल लाया गया। नछत्तर कहते हैं कि देश की रक्षा के लिए उनकी जान भी चली जाती तो भी गम नहीं था। उनका बेटा सिमरनजीत सिह बराड़ भी यूएस आर्मी में है।

    आसपास बिखरे थे शव, फिर आंख की चिंता क्या करते : सुखजीवन

    कारगिल युद्ध के दाैरान टाइगर हिल को फतेह करना सबसे मुश्किल टास्क था, क्योंकि यहां दुश्मन सबसे अच्छी पोजिशन पर तैनात था। इस चोटी को जीतने के लिए भारतीय सेना की ओर से तीन तरफ से दुश्मन की घेराबंदी की गई थी। दरअसल, सेना इस चोटी के उस रास्ते को कब्जाना चाहती थी, जहां से पाकिस्तानियों को राशन और गोला-बारूद की सप्लाई हो रही थी। इसी टास्क को पूरा करने वाली टीम में 8 सिख रेजिमेंट का सुखजीवन भी शामिल था। 

    गुरदासपुर के रहने वाले नायक सुखजीवन सिंह ने बताया कि यहां दुश्मनों की गोलाबारी से भारतीय सेना को काफी नुकसान हुआ, क्योंकि वे ऊंचाई पर अच्छी पोजिशन पर बैठे थे। आमने-सामने की लड़ाई हुई और आखिरकार दुश्मन को हराकर टाइगर हिल पर तिरंगा लहराया गया। इसी हमले में एक गोली ने उनकी आंख छलनी कर दी थी मगर उस वक्त मुंह से शहीद बाबा दीप सिंह जी व जो बोले सो निहाल… के जयकारे ही छूट रहे थे। आसपास कई जवानों के शव पड़े थे, ऐसे में आंख की चिंता क्या करते, बस जयकारे छोड़ते हुए फायरिंग किए जा रहे थे। उसके बाद उन्हें श्रीनगर अस्पताल लाया गया। आज उनकी एक आंख नहीं है मगर उस पल को याद कर सीना गर्व से चाैड़ा हाे जाता है।

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