धर्म और अध्यात्म की नगरी काशी में परंपराओं का एक ऐसा अनूठा संसार है, जो दुनिया को हैरान कर देता है. एक तरफ जहां माता अन्नपूर्णा के स्वर्णमई प्रतिमा के दर्शन होते हैं तो वहीं चौक के सुड़िया इलाके में स्थित राजवैद्य परिवार के प्रांगण में भगवान धन्वंतरि के भी दर्शन प्राप्त होते हैं. बड़ी बात ये है कि सिर्फ धनतेरस के दिन आम श्रद्धालुओं के लिए भगवान धन्वंतरि के कपाट खुलते हैं और उसके बाद फिर अगले वर्ष दर्शन प्राप्त होते हैं. पूरे साल में एक बार दीपावली के प्रथम दिन बड़ी संख्या में लोग जटिल रोगों से मुक्ति के लिए आशीर्वाद लेने के लिए पहुंचते हैं.
364 दिन बंद रहते हैं मंदिर के कपाट
भगवान धन्वंतरि की लगभग 325 साल पुरानी अष्टधातु की दुर्लभ प्रतिमा स्थापित है, जिसके कपाट साल के 364 दिन बंद रहते हैं. यह पवित्र दरबार केवल साल में एक बार धनतेरस के खास अवसर पर कुछ घंटों के लिए खुलता है. हाथों में अमृत कलश लिए भगवान धन्वंतरि के इस एक दिन के दुर्लभ दर्शन और यहां मिलने वाले विशेष औषधीय प्रसाद को लेकर ऐसी गहरी मान्यता है कि जो भी भक्त सच्चे मन से यहां पहुंचता है, उसे सालभर उत्तम स्वास्थ्य और आरोग्य का वरदान मिलता है. आधुनिकता की दौड़ के बीच काशी की यह परंपरा आज भी तन और मन की सेहत को ही सबसे बड़ा धन मानती है.
समुद्र मंथन के दौरान हुई उत्पत्ति
इस मंदिर को लेकर खास जानकारी देते हुए डॉ. उत्पल कुमार शास्त्री ने रोचक कथा सुनाई. बताते चलें कि पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी यानी धनतेरस के दिन भगवान विष्णु के अवतार के रूप में भगवान धन्वंतरि हाथों में अमृत का कलश लेकर प्रकट हुए थे. उन्हें देवताओं का वैद्य और आयुर्वेद का प्रवर्तक माना जाता है. आज के दिन इनके दर्शन से सभी प्रकार के रोगों से मुक्ति मिलती है.


