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    अजमेर शरीफ दरगाह के खादिम का कांग्रेस से तीखा सवाल: ‘मुसलमानों को सिर्फ दरी बिछाने और वोट बैंक की तरह इस्तेमाल करना बंद करे आलाकमान’

    अजमेर | देश के विभिन्न हिस्सों में होने वाले आगामी राज्यसभा चुनाव के बीच कांग्रेस सहित कई प्रमुख राजनीतिक दल एक नए विवाद में घिरते नजर आ रहे हैं। अजमेर की सुप्रसिद्ध ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती दरगाह की अंजुमन कमेटी के सचिव सैयद सरवर चिश्ती ने देश के राजनीतिक परिदृश्य पर गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं। उन्होंने रोष व्यक्त करते हुए कहा कि इस बार के उच्च सदन के चुनावों में किसी भी मुस्लिम चेहरे को प्रत्याशी नहीं बनाया गया है, जो संपूर्ण अल्पसंख्यक समाज के लिए अत्यंत निराशाजनक और चिंता का विषय है।

    धर्मनिरपेक्षता के दावों पर सवाल और उपेक्षा का आरोप

    सैयद सरवर चिश्ती ने एक वीडियो संदेश जारी कर विशेष रूप से कांग्रेस पार्टी को अपने निशाने पर लिया। उन्होंने कहा कि जो दल स्वयं को धर्मनिरपेक्ष और समाज के हर तबके का प्रतिनिधित्व करने वाला बताते हैं, उन्होंने देश के इतने महत्वपूर्ण सदन में भागीदारी तय करते समय मुस्लिम समुदाय को पूरी तरह दरकिनार कर दिया। चिश्ती ने सवाल उठाया कि जब यह समाज पारंपरिक रूप से राजनीतिक दलों का पुरजोर समर्थन करता आया है, तो उम्मीदवारों की चयन प्रक्रिया में इसकी अनदेखी क्यों की गई। उन्होंने इसे एक बड़ी राजनीतिक उपेक्षा करार देते हुए कहा कि इस कदम से अल्पसंख्यक वर्ग के बीच एक बेहद नकारात्मक संदेश जा रहा है।

    लोकतांत्रिक भागीदारी और आत्ममंथन की अपील

    दरगाह कमेटी के सचिव ने रेखांकित किया कि एक जीवंत लोकतंत्र की सार्थकता तभी है जब उसमें सभी वर्गों और समुदायों की आनुपातिक हिस्सेदारी सुनिश्चित हो। राज्यसभा जैसे गरिमामयी और नीति-निर्धारक सदन में हर समाज की आवाज गूंजनी चाहिए, परंतु वर्तमान सांगठनिक निर्णयों में इस विविधता का अभाव साफ दिखाई दे रहा है। उन्होंने सभी प्रमुख राजनीतिक दलों से इस संवेदनशील विषय पर गंभीरता से आत्ममंथन करने का आग्रह किया है ताकि किसी भी वर्ग में खुद के अलग-थलग पड़ने की भावना जागृत न हो।

    राजनीतिक गलियारों में हलचल और बढ़ती असहजता

    अजमेर दरगाह से उठी इस मुखर आवाज के बाद राज्यसभा चुनाव में अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व का यह पुराना मुद्दा एक बार फिर राष्ट्रीय पटल पर गरमा गया है। सियासी हलकों में अब यह चर्चा तेज हो गई है कि आखिर मुख्यधारा के दलों ने इस बार किसी मुस्लिम राजनेता को संसद भेजने का विकल्प क्यों नहीं चुना। इस वैचारिक विरोध ने चुनावी समर के बीच कांग्रेस के लिए एक असहज स्थिति उत्पन्न कर दी है, जिसे आने वाले समय में अन्य विपक्षी दल भी राजनीतिक रूप से भुनाने का प्रयास कर सकते हैं।

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