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    Homeराजनीतिभाषाई लड़ाई अब महाराष्ट्र तक पहुंची, यह एकता का संकेत

    भाषाई लड़ाई अब महाराष्ट्र तक पहुंची, यह एकता का संकेत

    उद्धव-राज ठाकरे के मिलन पर सीएम स्टालिन ने की खुशी जाहिर

    चेन्नई/मुंबई। महाराष्ट्र की राजनीति में बड़ा घटनाक्रम देखने को मिला जब उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे सालों बाद एक मंच पर नजर आए। शनिवार को मुंबई में आयोजित वॉयस ऑफ मराठी रैली में दोनों नेताओं ने एक-दूसरे को गले लगाकर दूरियों खत्म करने का संकेत दिया। इस ऐतिहासिक मिलन से तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम के स्टालिन बहुत खुश नजर आए और उन्होंने इसे भाषाई अधिकारों की लड़ाई में एक नया मोड़ बताया।
    सीएम स्टालिन ने सोशल मीडिया एक्स पर लिखा-तमिलनाडु में हिंदी थोपने के खिलाफ जो लड़ाई दशकों से चली आ रही है, वह अब राज्य की सीमा से निकलकर महाराष्ट्र तक पहुंच गई है। यह एकता का संकेत है कि भारत की भाषाई विविधता का सम्मान किया जाना चाहिए। स्टालिन ने कहा कि देशभर के क्षेत्रीय नेता अब अपनी-अपनी मातृभाषाओं की रक्षा के लिए साथ आ रहे हैं, जिससे केंद्र सरकार को साफ संदेश मिल रहा है कि हिंदी को देश पर थोपने की राजनीति स्वीकार नहीं की जाएगी।
    मुंबई में आयोजित वॉयस ऑफ मराठी रैली में महाराष्ट्र सरकार द्वारा तीन-भाषा नीति को वापस लिए जाने का स्वागत किया गया। मंच से उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे ने मराठी को राज्य की प्राथमिक भाषा बताते हुए कहा कि हिंदी को थोपने का कोई औचित्य नहीं है। मनसे प्रमुखा राज ठाकरे ने मंच से कहा कि मराठी पहले है। महाराष्ट्र में हर बच्चे को मराठी आनी चाहिए। वहीं उद्धव ठाकरे ने कहा कि भाषा के नाम पर विभाजन की जरूरत नहीं, पर मराठी को सम्मान जरूर मिलना चाहिए।
    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ठाकरे बंधुओं की नजदीकी आने वाले मुंबई, पुणे, नासिक और ठाणे जैसे शहरों के नगर निकाय चुनावों में असर डाल सकती है। अगर मनसे और शिवसेना (यूबीटी) में गठबंधन होता है, तो यह महाविकास आघाड़ी (एमवीए) और बीजेपी दोनों के लिए चुनौती बन सकता है। हालांकि राज ठाकरे के पुराने विवादित बयानों, खासकर मस्जिदों में लाउडस्पीकर को लेकर, अल्पसंख्यक मतदाताओं की नाराज़गी भी देखने को मिल सकती है, जिससे गठबंधन की राजनीति में संतुलन बनाना मुश्किल हो सकता है।
    एक तरफ उद्धव-राज मिलन महाराष्ट्र में मराठी अस्मिता और क्षेत्रीय गर्व का प्रतीक बन रहा है, तो दूसरी ओर स्टालिन जैसे नेता इसे राष्ट्रीय स्तर पर भाषाई अधिकारों की एकता के रूप में देख रहे हैं। यह घटनाक्रम न केवल राजनीति बल्कि भाषाई संस्कृति और क्षेत्रीय पहचान की बहस को नई दिशा दे सकता है।

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